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पृष्ठ:जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ.pdf/१११

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बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थीं । मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुंचना था। कलकते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्दान को देखने की इच्छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता, तो और भी…मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना था।

दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के कनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी; यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्टा कर रहा था, तब जैसे स्वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण-भर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। मैंने उसक पीठ थपथपाते हुए पूछ —‘आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं ?’

‘माँ ने कहा है कि आज तुरन्त चले आना। मेरी घड़ी समीप है।’—अविचल भाव से उसने कहा।

‘तब भी तुम खेल दिखलाने चले आये।’मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्य के सुख-दुःख का माप अपना ही साधन तो है। उसी के अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुँह पर वही परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी।

उसने कहा—‘ क्यों न आता!’

और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।
क्षण-भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गयी। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते ए मने कहा—‘जल्द चलो।’ मोटरवाला मेरे बताये ए पथ पर चल पड़ा।

कुछ ही मिनटों में मैं झोपड़ी के पास पहुंचा। जादूगर दौड़कर झोपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था; किन्तु स्‍त्री के मुँह से, ‘बे…’ निकलकर रह गया। उसके दर्बल हाथ उठकर गिर गये। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था; मैं स्तब्ध था। उस उज्वजल धूप में सम्रग संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।