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पृष्ठ:जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ.pdf/१३५

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दस्यु के हाथ में जाने से बचा। आबाल-वृद्ध-नारी आनन्द से उन्मत्त हो उठे।

उषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हुँकार करते हुए कहा--'वध करो!' राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी --'प्राण-दण्ड!' मधूलिका बुलाई गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कौशल-नरेश ने पूछा--मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, मांग। वह चुप रही।

राजा ने कहा--मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुम्हें देता हूँ। मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा। उसने कहा--मुझे कुछ न चाहिए। अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा-नहीं, मैं तुझे अवश्य दूंगा। माँग ले


तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले। कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा खड़ी हुई।