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पृष्ठ:जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियाँ.pdf/१५५

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हुआ नृत्य आरम्भ हुआ। उसके नूपुर खुले हुए बोल रहे थे। वह नाचने लगी, जैसे जलतरंग। वागीश्वरी के विलम्बित स्वरों में अंगों के अनेक मरोड़ों के बाद जब कभी वह चुन-चुनकर एक-दो घुँघरू बजा देती, तब अकबर 'वाह! वाह !' कह उठता। घड़ी-भर नाचने के बाद जब शहनाई बन्द हुई, तब अकबर ने उसे बुलाकर कहा--'नूरी! तू कुछ चाहती है?'

'नहीं, जहाँपनाह!'

'कुछ भी?'

'मैं अपनी माँ को देखना चाहती हूँ! छुट्टी मिले, तो!'-–सिर नीचे किये हुए नूरी ने कहा।

'दत्-और कुछ नहीं?'

'और कुछ नहीं।'

'अच्छा, तो जब मैं काबुल चलने लगूँगा, तब तू भी वहाँ चल सकेगी।'

फिर गोटें चलने लगीं। खेल होने लगा। सुलताना और शहंशाह दोनों ही इस चिन्ता में थे कि दूसरा हारे। यही तो बात है, संसार चाहता है कि तुम मेरे साथ खेलो, पर सदा तुम्हीं हारते रहो। नूरी फिर गोट बन गयी थी। अब की वही फिर पिटी। उसने कहा--'मैं मर गयी।'

अकबर ने कहा--'तू अलग जा बैठ।' छुट्टी पाते ही थकी हुई नूरी पचीसी के समीप अमराई में जा घुसी। अभी वह नाचने की थकावट से अँगड़ाई ले रही थी कि सहसा याकूब ने आकर उसे पकड़ लिया। उसके शिथिल सुकुमार अंगों को दबाकर उसने कहा--'नूरी, मैं तुम्हारे प्यार को लौटा देने के लिए आया हूँ।'

व्याकुल होकर नूरी ने कहा--'नहीं, नहीं, ऐसा न करो।'

'मैं आज मरने-मारने पर तुला हूँ।'

'तो क्या तुम आज फिर उसी काम के लिए...'

'हाँ नूरी!'

'नहीं, शाहजादा याकूब! ऐसा न करो। मुझे आज शहंशाह ने काश्मीर जाने की छुट्टी दे दी है। मैं तुम्हारे साथ भी चल सकती हूँ।'

'पर मैं वहाँ न जाऊंगा। नूरी! मुझे भूल जाओ।'

नूरी उसे अपने हाथों में जकड़े थी; किन्तु याकूब का देश-प्रेम उसकी प्रतिज्ञा की पूर्ति माँग रहा था। याकूब ने कहा--'नूरी! अकबर सिर झुकाने से मान जाए सो नहीं। वह तो झुके सिर पर भी चढ़ बैठना चाहता है। मुझे छुट्टी दो। मैं यही सोचकर सुख से मर सकूँगा कि कोई मुझे प्यार करता है।'

नूरी सिसककर रोने लगी। याकूब का कन्धा उसके आँसुओं की धारा से भीगने लगा। अपनी कठोर भावनाओं से उन्मत्त और विद्रोही युवक शाहजादा ने बलपूर्वक अभी अपने को रमणी के बाहुपाश से छुड़ाया ही था कि चार तातारी दासियों ने अमराई के अँधकार से निकलकर दोनों को पकड़ लिया।

अकबर की बिसात अभी बिछी थी। पासे अकबर के हाथ में थे। दोनों अपराधी सामने लाये गये। अकबर ने आश्चर्य से पूछा--'याकूब खाँ?'