यदि साम्यवादियों को केवल ललित वाक्यावली का उच्चारण करने पर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना है, यदि साम्यवादी साम्यवाद को एक निश्चित वस्तु बनाना चाहते हैं, तब उन्हें यह ज़रूर मानना पड़ेगा कि सामाजिक सुधार की समस्या सब का मूल है और वे उस पर आँख बन्द नहीं कर सकते। भारत में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी बात है, जिस के साथ साम्यवादी को अवश्य निबटना पड़ेगा; जब तक वह इस के साथ नहीं निबटेगा, वह क्रान्ति उत्पन्न नहीं कर सकता; और यदि सौभाग्य से उसे क्रान्ति उत्पन्न करने में सुफलता भी प्राप्त हो जाय तो भी, यदि वह अपने आदर्श को सिद्ध करना चाहता है, उसे इस के साथ लड़ना पड़ेगा। यदि वह क्रान्ति के पहले ऊँच-नीच-मूलक वर्ण-व्यवस्था पर विचार करने को तैयार नहीं तो क्रान्ति के बाद उसे इस पर विचार करना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में हम यही बात यों कह सकते हैं कि आप किसी भी ओर मुंँह कीजिए, वर्ग-भेद एक ऐसा राक्षस है, जो सब ओर आप का मार्ग रोके पड़ा है। जब तक आप इस राक्षस का वध नहीं करते, आप न राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और न आर्थिक सुधार।
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चातुर्वण्र्य के साथ सवर्ण हिन्दुओं का इतना मोह है कि वे इस समय इसको समाज-घातक देखते हुए भी इसका विध्वंस करने को तैयार नहीं। बड़े बड़े देश-भक्त और बड़े बड़े साम्यवादी हिन्दू-नेता वर्ण-व्यवस्था का विध्वंस देखना सहन नहीं कर सकते।