था। इस से स्पष्ट हो जाता है कि राम ने शम्बूक की क्यों हत्या की। इस से यह भी पता लग जाता है कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए राज-दण्ड का होना क्यों आवश्यक है। न केवल दण्ड का विधान ही, वरन् प्राण-दण्ड का होना आवश्यक है। इसीलिए राम ने शम्बूक को मृत्यु से कम दण्ड नहीं दिया। इसी लिए वेद-मन्त्र को सुनने या उसका उच्चारण करने वाले शूद्र के लिए मनुस्मृति कान में पिघला हुआ सीसा भर देने की या उसकी जिह्वा काट डालने की आज्ञा देती है। चातुर्वर्ण्य के पक्षपातियों को जनता को विश्वास दिलाना होगा कि वे मनुष्य- समाज की जाँच-पड़ताल करके उसे सफलतापूर्वक चार वर्गों में विभक्त कर सकते हैं और इस २०वीं शताब्दी में वे आधुनिक समाज को मनुस्मृति की दण्डाज्ञायें पुनः प्रचलित करने के लिए तैयार कर सकते हैं। ऐसी अवस्थाओं में, जन्मसिद्ध गावदी के सिवा दूसरा कोई भी समझदार मनुष्य कभी यह आशा और विश्वास नहीं कर सकता; कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था पुनः जीवित हो सकती है।
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यदि मान भी लिया जाय कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था साध्य है, तो भी कहना पड़ेगा कि यह अतीव हानिकारक व्यवस्था है। इसका अर्थ यह है कि थोड़े-से इने-गिने मनुष्यों के निमित्त बहु-संख्यक जनता को कङ्गाल बना दिया जाय। इसका अर्थ यह है कि थोड़े-से लोगों की खातिर बहुत से लोगों को निःशस्त्र कर