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पृष्ठ:जातिवाद का उच्छेद - भीम राव अंबेडकर.pdf/३३

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श्रम की महत्व-हानि

पुराण स्पष्ट कहता है कि कृष्ण का अवतार क्षत्रियों के विध्वंस के लिए ही हुआ था। इन घटनाओं और उदाहरणों की विद्यमानता में कौन व्यक्ति चातुर्वण्य-व्यवस्था को एक आदर्श व्यवस्था बता कर हिन्दू-समाज में पुनः उस स्थापित करने का साहस कर सकता है।


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श्रम की महत्व-हानि

खेद का विषय है कि आज भी वर्ण-भेद के समर्थक पाए जाते हैं। इसके समर्थन में वे अनेक युक्तियाँ देते हैं। वे कहते हैं कि वर्ण-भेद केवल श्रम-विभाग का दूसरा नाम है, और कि यदि प्रत्येक सभ्य समाज के लिए श्रम-विभाग आवश्यक है, तो फिर वर्ण-भेद में कुछ भी हानि नहीं। इस मत के खण्डन में पहली बात यह है कि वर्ण-भेद केवल श्रम-विभाग नहीं। यह साथ ही श्रमिक-विभाग भी है। निस्सन्देह सभ्य समाज को श्रम-विभाग की आवश्यकता है। परन्तु किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाग के साथ साथ, हिन्दू समाज की तरह, श्रमिकों का भी अस्वाभाविक विभाग नहीं पाया जाता। वर्ण-भेद केवल श्रमिक-विभाग ही नहीं—जोकि श्रम-विभाग से एक सर्वथा भिन्न चीज़ है—वरन् यह एक ऐसा श्रेणीबद्ध समाज है, जिस में श्रमिकों के विभागों को एक दूसरे के ऊपर क्रम से रखा गया है। किसी भी दूसरे देश में श्रम-विभाग के साथ साथ यह श्रमिकों का क्रम-विन्यास नहीं।

वर्णभेद-सम्बन्धी इस दृष्टिकोण के विरुद्ध एक तीसरी आपत्ति भी है। यह श्रम-विभाग स्वयंजात नहीं, इसका आधार