चुपके से सहन कर लेता है। आप उन में, श्रीयुत मारिस के शब्दों में, बड़ों को छोटों को रौंदते, सबलों को निर्बलों को पीटते, क्रूरों को किसी से न डरते, दयालुओं को साहस न करते और बुद्धिमानों को परवा न करते हुए पाते हैं। सभी हिन्दू देवताओं के क्षमाशील होते हुए भी हिन्दुओं में दलितों और अत्याचार-पीड़ितों की दयनीय दशा किसी से छिपी नहीं। उदासीनता से बढ़कर बुरा और कोई रोग नहीं हो सकता। हिन्दू इतने उदासीन क्यों हैं? मेरी राय में यह उदासीनता वर्ण-भेद का ही परिणाम है। वर्ण-भेद ने किसी अच्छे काम के लिए भी सङ्गठन और सहयोग को असम्भव बना दिया है।
[ १६ ]
हिन्दुओं के आचार-शास्त्र पर वर्ण-भेद का प्रभाव बहुत खेदजनक हुआ है। वर्ण-भेद ने सार्वजनिक भाव को मार डाला है। वर्ण-भेद ने सार्वजनिक वदान्यता के भाव को नष्ट कर दिया है। वर्ण-भेद ने लोक-मत को असम्भव बना दिया है। एक हिन्दू की जनता उस का अपना वर्ण ही है। उस का उत्तरदायित्व उस के अपने ही वर्ण के प्रति है। उस की भक्ति उस के अपने वर्ण तक ही परिमित है। वर्ण-भेद ने सद्गुण को दबा दिया है और सदाचार को जकड़ दिया है। पात्र के लिए कोई सहानुभूति नहीं रही। गुणी के गुणों की कोई प्रशंसा नहीं। भूखे को दान नहीं दिया जाता। किसी को कष्ट में देख कर उस की सहायता का भाव नहीं उत्पन्न होता। दान होता ज़रूर है, परन्तु वह अपने ही वर्ण से आरम्भ होकर अपने ही वर्ण के साथ समाप्त हो जाता है। सहानुभूति है, परन्तु दूसरे वर्णों के