महात्मा गाँधी भी शामिल हैं, ऐसा जान पड़ता है, वे इस बात को नहीं समझते कि लोगों के आचरण उन विश्वासों के परिणाम मात्र हैं जो शास्त्रों ने उनके मन में बैठा दिये हैं। लोग तब तक अपने उस आचरण को नहीं बदल सकते जब तक कि उनका विश्वास उन शास्त्रों पर से नष्ट नहीं होता जो उनके आचरण के आधार हैं। इस लिए यदि जात-पाँत तोड़क आन्दोलन को अभी तक उतनी सफलता नहीं हुई तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। जात-पाँत तोड़ने वाले भी वही भूल कर रहे हैं, जो छूत-छात दूर करने वाले कर रहे हैं। अन्तरवर्णीय सहभोजों और विवाहों के लिए आन्दोलन एवं प्रबन्ध करना कृत्रिम उपायों से ज़बर्दस्ती भोजन ठूसने के समान है। प्रत्येक स्त्री और पुरुष को शास्त्रों की दासता से मुक्त कर दीजिए, शास्त्रों पर आश्रित हानिकारक भावनाओं को उनके मन से निकाल डालिए, फिर आप को उन से कुछ कहने की आवश्यकता न रहेगी। वे अपने आप जात-पाँत तोड़ कर खान-पान और ब्याह शादी करने लगेंगे।
वाक् छल में शरण लेने से कुछ लाभ नहीं । लोगों को यह कहने से कुछ लाभ नहीं कि शास्त्र वह बात नहीं कहते जो तुम विश्वास किए बैठे हो। महत्व की बात यह नहीं कि व्याकरण की दृष्टि से पढ़ने अथवा तर्क की दृष्टि से व्याख्या करने पर, शास्त्र क्या कहते हैं। वरन् महत्व की बात यह है कि लोग शास्त्रों का अर्थ क्या लेते हैं। हमें वही स्थिति ग्रहण करनी चाहिए जो बुद्ध ने ग्रहण की थी। हमारी स्थिति वही होनी चाहिए जो गुरु नानक की थी। हमें शास्त्रों का परित्याग करने की नहीं, वरन् बुद्ध और नानक की तरह उन को प्रामाणिक या धर्म-ग्रन्थ मानने से इनकार करने की आवश्यकता है। हम में साहस होना चाहिए कि हम