भाव यहाँ तक बढ़ा कि जब सामाजिक सम्मेलन ने अपना अलग पण्डाल खड़ा करना चाहा, तो उस के विरोधियों ने उसे जला डालने की धमकी दे दी। इस प्रकार कालान्तर में राजनीतिक सुधार के पक्षपातियों का दल जीत गया और सामाजिक सम्मेलन (सोशल कान्फरेन्स) निरोहित हो कर विस्मृत हो गया। सन् १८९२ में मि० डब्ल्यू० सी० बनर्जी इलाहाबाद में काँग्रेस के आठवें अधिवेशन के प्रधान हुए थे। उन्हों ने उस समय जो भाषण दिया था, वह एक प्रकार से सोशल कान्फरेन्स का अन्त्येष्टि-भाषण था। आप के शब्द थेः—
“मैं उन लोगों के साथ सहमत नहीं हूँ जो कहते हैं कि जब तक हम अपनी सामाजिक पद्धति का सुधार नहीं करते, तब तक हम राजनीतिक सुधार के योग्य नहीं हो सकते। मुझे इन दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं दीखता।... क्या हम (राजनीतिक सुधार के लिए) इस लिए योग्य नहीं हैं, क्योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता और दूसरे देशों की अपेक्षा हमारी लड़कियाँ छोटी उम्र में ब्याह दी जाती हैं? या हमारी पत्नियाँ और पुत्रियाँ हमारे साथ गाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जातीं? या क्यों कि हम अपनी बेटियों को आक्सफोर्ड और केम्ब्रिज नहीं भेजते? (हर्षध्वनि)।”
उस समय अनेक ऐसे लोग थे और अब भी हैं, जो इस विषय में काँग्रेस की जीत देख कर प्रसन्न थे। परन्तु जो लोग सामाजिक सुधार के महत्व में विश्वास रखते हैं, वे पूछ सकते हैं कि क्या मिस्टर बनर्जी की बात का कोई उत्तर नहीं? क्या इस से सिद्ध होता है कि विजय उन्हीं की हुई, जो सच्चे थे? क्या