लिखित आज्ञायें माननी पड़ेंगी:—(१) बलाई तिलाई पगड़ी नहीं बाँधेंगे। (२) वे रङ्गीन या सुन्दर किनारे वाली धोतियाँ नहीं पहनेंगे। (३) वे किसी हिन्दू का मृत्यु-समाचार उसके संबन्धियों को पहुँचायेंगे, चाहे वे सम्बन्धी कितनी ही दूर क्यों न रहते हों। (४) हिन्दुओं के विवाह में बरात के आगे आगे बलाई बाजा बजाते हुए चलेंगे। (५) बलाई स्त्रियाँ सोने-चाँदी के गहने नहीं पहनेंगी; वे सुन्दर घाँघरे और जाकेट नहीं पहनेंगी। (६) बलाई स्त्रियाँ हिन्दू स्त्रियों की प्रसूती में उनकी सेवा करेंगी। (७) बलाई हिन्दुओं की सेवा करेंगे और इसके लिये कोई पारिश्रमिक नहीं माँगेंगे; हिन्दू अपने-आप जो कुछ उन्हें दे दें, उसी पर वे सन्तुष्ट हो जायेंगे। (८) यदि बलाइयों को ये बातें स्वीकार न हों, तो वे गाँव छोड़ कर चले जायँ। बलाइयों ने इन आज्ञाओं को मानने से इनकार कर दिया; और हिन्दुओंने उनका विरोध शुरू किया। बलाइयों को गाँव के कुओं से पानी भरने और अपने पशु चराने से रोक दिया गया। बलाइयों को हिन्दुओं की भूमि में से होकर जाने से मना कर दिया गया। इसलिए यदि बलाई के खेत के इर्द-गिर्द हिन्दुओं के खेत हों, तो बलाई अपने खेत में नहीं जा सकता था। हिन्दुओं ने अपने पशु बलाइयों के खेतों में छोड़ दिये। बलाइयों ने इस अत्याचार के विरुद्ध इन्दौर-दरबार में आवेदन-पत्र दिये। परन्तु उनको ठीक समय पर सहायता न मिल सकी और अत्याचार उसी प्रकार जारी रहा। इसलिए सैकड़ों बलाइयों को, स्त्री-बच्चों सहित उन घरों को छोड़कर, जहाँ उनके बाप-दादा पीढ़ियों से रहते आये थे, धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्वालियर और दूसरे निकटवर्ती राज्यों के गाँवों में चला जाना
पृष्ठ:जातिवाद का उच्छेद - भीम राव अंबेडकर.pdf/९
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