पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१४९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( १२६ ) बरुनि चाप स औोषदेंवेध रन बन ढाँख । सजहि तन सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख ॥ पृथ्वी और स्वर्गजीव औौर ईश्वरदोनों एक थे, बोच में न जाने किसने इतना -भेद डाल दिया है धरती सरग मिले हुत दोऊ। केइ निनार के दीन्ह विछऊ । जो इस पृथ्वी औौर स्वर्ग के वियोगतत्व को समझेगा औौर उस वियोग में पूर्ण रूप से सम्मिलित होगा उसी का वियोग सारी सृष्टि में इस प्रकार फैला दिखाई सूरुज बूड़ि उठा होइ ताता। औौ मजीठ टे बन राता ॥ भा बसंतरातों बनसपतो। श्री राते सब जोगी जती ॥ भूमि जो भीजि भएड सब गेरू। नौ राते सब पंखि पखेरू ॥ राती सतो, अगिनि सब काया। गगन मेघ राते तेहि छाया । सायं प्रभात न जाने कितने लोग मेघखंडों को रक्तवर्ण होते देखते हैं पर किस अनुराग से वे लाल हैं इसे जायसी ऐसे रहस्यदर्शी भावुक ही समझते हैं । प्रकृति के सारे महाभूत उस अमरधाम तक पहुँचने का बराबर प्रयत्न करते रहते हैं पर साधना पूरी हुए बिना पहुंचना असंभव है- धाइ जो बाजा के मन साधा। मारा चक्र, भएछ ॥ दुइ आाधा चाँद सुरुज औ श्री नखत तराई। तेहि डर अंतरिक्ष फिरिहैिं सबई ॥ पवन जाइ ताँ पहुँचे चहा । मारा तैस लोटि भर्ती रहा । अगिनि उठी, लरि बुझौ निशाना । धध उठा, उठेि बोच बिलाना ॥ पानि उठा, उठि जाइ न यू था ।’ बहरा रोड, प्राइ हूँ व था। इस अद्वैतो रहस्यवाद के अतिरिक्त जायसो कहीं कहीं उस रहस्यवाद में आ फंसे जो पाश्चात्यों ‘झठा रहस्यवादस्थान पर हैं की दृष्टि में ' है । उन्होंने स्थान हठयोग, रसायन आादि का भी नाश्रय लिया है । सूक्तियाँ सूक्तियों मेरा अभिप्राय वैदैित्यपूर्ण जिसमें वाक्चातुर्य ही से उक्तियों से है प्रधान है बात ढंग से कही जाय लोगों का होता । कोई यदि नए अनूठे तो उससे बहुत कुछ मनोरंजन हो जाता है, इससे कवि लोग वादग्ध्य से प्रायकाम लिया करते हैं । नीति संबंधी पद्यों में चमत्कार की योजना अकसर देखने में जाती है । जैसे, बिहारी के कनक कनक ते सौ गुनी वाले दोहे में अथवा रहीम के इस प्रकार के दोहों में (क) बड़े पेट के भरन में, है दुख बाढ़ि । । रहीम तातें हाथी हहरि , दिए दाँत है काढ़ि । १. 'उठि जाइ न ग्रा' के स्थान पर यदि 'उटि होइ गा धूआा' पाठ होता तो गौर भी अच्छा होता ।