पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२२०

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३८
पदमावत

३८ पदमावत कनक पाट जन बंटा राजा। सर्वे गिार पुत्र ने 8 साजा ॥ मोहि जागे थि र रहा न को। हूँ का कहें अस जुड़े सैंज ॥ रजंरग, धनुक, नक बान , जग मारन तिन्ह दें । सुनि के परा मुरुछि (राजा) मोक ईं हए कुटा॥ ३ ॥ भौंहें स्यान धनुक जन ताना। सटू हेर मार विष बाना । हने धुनै उन्ह भहरि चढ़े । केइ हतियार काल ग्रस गढ़े ? उहै धनुक किरन पर प्रहा । उहै धनु राघौ कर गहा ॥ मोहि भ्रमुक भवन संघारा। श्रोहि धनक कंसासुर मा रा ॥ श्रोहैि धनु ; बेधा त राह। माग घोहि सहस्त्राबाढ़ ।। उहै धनुक मैं तापतें चीन्हा। धानुक आाप बेV जग कीन्हा ॥ उन्ह भौंहनि सरि केउ न जीता। अबूरी छपीं, छपीं गोपीता ॥ भौंह धनुक, धनि धानुक, दूसर सरि न कराई । गगन धनुक जो ऊ, लाजहि स पि जाइ ४ ॥ ! नैन बाँक, सरि पूछ न कोऊ। मानसरोदक उलथदि दोऊ । राते कंवल काहि अलि भवाँ। धूमहि मावि चहहि अगसवाँ | उठहि तुरंग ले हि नहि बागा। चाहह उन्लथि गगन कहूँ लागा। पवन झकोरह देइ हिलोरा । सरग लाल भर्फ लाल बहोरा ॥ डोले डोलन ननाहाँ । उलट अड़ार जाहि पल माह ! ॥ जबहि फिराह गगन गति बोरा। श्रेस धर चत्र के जोरा । समुद हिलोर फिरह जनु झूले । खंजन लरहि, मिरिग जनु झूले ॥ सूर सरोवर नयन बैं, मानिक ने तरंग । ावत ीर फिरावहीं, काल भर तेहि संग बरुनी का वरन * इमि बनी। साधे बान जान टु ई ग्रनी !। जुरी राम राबन के सैना । बीच समुद्र भए दुइ नैना ॥ बारह पार बदावरि साधा। जा सहें और लाग विप बाध। ॥ उन्ह अस जो । बेधि रहा सग संसारा बानन्ह को न मारा गगन नखत जो जाहि न गने। वे सब बान श्रोही के हने ॥ धरती ठान वे िसब राखी। साखी टाढ़ देहि सब सावी ॥ रो रोवं मानुष तन साढ़े । सूहि सूत बध आरा गाहें । सोहाग = (क) गौभाय, (ख) सोहागा । (३) श्रोती = उतनी । अब = अस्त्र हए = हने, मारा । (४) सहूँ । = सामने । हृत = था । भ , = ध्य, झा, निसाना। (५) उराथह = उ ढ़लते हैं । भवाँ = फ्रा, चक्र । अपसवाँ चहरिह = जाना चाहते हैं, उड़कर भागना चाहते हैं (अपनवण ) । (६) उलचि" पल साहा = बड़े बड़े अड़नेवाले या स्थिर रहने वाले पल भर में उलट जाते हैं ।