पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२२७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
४५
प्रेम खंड

प्रम खड ४५ महुठ हाथ तन सरवर, हिया कॉल तेहि माँह । नैनहि जानहु नीयरे, कर पहुँचय औौगाह ॥ ३ ॥ सबन्ह कहा मन राजा। काल सेंति जझ न छाजा ।। समुह के जू तास जूझ जात जो जीता। जानत कृष्ण तजा गोपीता ॥ ऑौ न "नेह काह साँ कीजै । नाँव मि, काहे जिउ दी ॥ पहिले सुख नेहहिं जब जोरा। पुनि होइ कठिन निबाहत ओोरा ॥ महुछ हाथ तन जैस सुमेरू । पहुँचि न जाइ परा तस फेरू ॥ ज्ञान दिस्टि स जाइ पहुँचा। पेम अदिस्ट गगन तें ऊँचा ॥ धुव ऊँच पेमधुव ऊंचा। सिर देइ पाँव देह सो आा ॥ तुम राजा ऑौ सुखिया, करहु राज सुख भोग एहि रे पंथ सो पहुँचेसहै जो दुःख वियोग सुऐ कहा मन बूझह राजा । करव पिरीत कठिन है । काजा ॥ तुम राजा जेई "घर पोई। कर्नेल न भेंटेजभटेड कोई ॥ जानहि भर जी तेहि पथ लट। जीउ दीन्ह औौ दिएहु न छूटे ॥ कठिन ग्राहि सिंघल कर राज । पाइ नाहि जूझ कर साजू ॥ श्रोहि पथ जाइ जो होइ उदासी । जोगी, जती, तपा, सन्यासी ॥ भोग किए ज पावत भोग। तजि सो भोग कोइ करत न जोगू ॥ तुम राजा चाहह सुख पावा। भोगहि जोग करत नहि भावा ॥ साधन्ह सिद्धि न पाइय, जौ लगि सधे न तप्प । सो पे जाने बापुराकरें जो सीस कलप्प का भा जोग कथनि के कथे। निकटें घिछ न बिना दधि मथे ॥ जी लहि थाप हाइ न कोई । तौ लहि हेरत पाव न सोई ॥ पेम पहर कठिन विधि गढ़ा। सो पै चढ़े जो सिर स चढ़ा। पंथ सूरि के उठा तू रू। चोर चहै, की चढ़ मंसूरू तू राजा का पहिरसि कंथा । तोरे घरहि मक्ष दस पंथा ॥ कामक्रोधतिस्ना, मदमाया। पाँचौ चोर न छोड़हि काया ॥ नेवी सेंध तिन्ह के दिठियारा। घर सह निसिस, को उजियारा ॥ पहुछ = साढ़े तोन (सं७ -चतुर्थ, कल्पित रूप 'आध्युष्ठ, प्राध प्रड्डु) जैसे-कबहूं तो ग्रहुट परग की बसुधा, कबरें देहरी उलुधि न जानी।।सूर । सरवर-पाठांतर तरिवर। (४) काल सेंति - काल से (प्रा० वि० संतो) । श्रढठ = द० ३। व = ध्रुव । सिर देइ छू ग्रा = सिर काटकर उसपर पैर रखकर खड़ा हो; जैसे--सोस उतारे भूई धरे तापर राधे पाँव। दास कबीरा यों कहै ऐसा होय तो पाब ॥' (५) पोई = पकाई हुई। तुम..पोई = अब तक पको पकाई खाई अर्थात् आाराम चैन से रहे । साधन्ह = केवल साध या इच्छा से । कलप करे = काट डाले (सं० क्लप्त)। (६) सूरि = सूली। दिठियार = देख में, देखा हुआ । मू िजाहि = चुरा ले भु