पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२३०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
४८
पदमावत

सब निबहै ताँ भापनि साँठी। साँठि बिना सो रह मुख माँटी ॥ राजा चला साजि के जोगू । साजह बेगि चलह सब लोगू ॥ गरब जो चढ़े तुरय के पीठी । अब भुईं चलहु सरग के डीठी ॥ मंतर लेहु होह ढंग लागू । गुदर जाइ सब होइहि प्रागू ॥ का निचित रे मानसआापन चीते आाछ । लेहि सजग होइ अगर्मेनमन पछिताव न पाए॥ ३ ॥ बिनवै रत्नसेन के माया। माथे छात, पाट निति पाया। बिलसणु नौ लख लच्छि पियारी। राज ईि जिनि होह भिखारी ॥ निति चंदन लागे जेहि देहा । सो तन देख भरत अब खेहा ॥ सब दिन करत तुम भोगू । सो जैसे साधब तप जोगू कैसे धूप सइव बिनु छाहाँ। कैसे नींद परिहि भुइ माहाँ कैसे घोड़ब काथरि कथा । कसे पार्ट चलब तुम पंथा ? ॥ कैसे सहब खिनहि खिन भूखा । से खाब कुरकुटा रूखा राजपाटदर, परिगह तुम्ह ही स उजियार । बैठि भोग रस मानह, के न चलह अंधियार ॥ ४ ॥ मोहि यह लोभ सुनाव न माया । काकर सुख काकर यह काया । जो निशान तम होइहि छारा। माटिह पोखि मर्ग को भारा ? का भूल एहि चंदन चोवा । वैरी जहाँ भंग कर रोवाँ ॥ हाथ, पाँव, सरवन औों आंखी। ए सब उहाँ भरह मिलि साखी ॥ सूत सूत तन बोलहि दोब। कई कैसे होइहि गति मोलू ज भल होत राज श्री भोग। गोपिचंद नहि साधत जोगू ।। उन्ह हि दीठि जो देख परेवा। तजा राज कजरी बन सेवा ॥ देखि अंत आस होइहि गुरू दोन्ह उपदेस । सिंघलदीप जाब हम, माता ! देहु देस ॥ ५ ॥ नागमती रनिवासू । केइ तुम्ह कंत दीन्ह बनवा अब को हमह करिहि भोगिनी । हमहूं साथ होव जोगिनी ॥ की हम्ह लावह अपने साथा। की अब मारि चलए एहि हाथा तुम्ह अस विर पीउ पीरीता । जहँवाँ राम तहाँ ढंग सोता ॥ जो लहि जिउ सँग छाड़ न काया। करिहाँ सेवपखरिहाँ पाया भलेहि पदमिनी रूप अनूपा। हमने कोई न आागरि रूपा ॥ होइहि = पेश होइए । हाजिर होइए आापनि चीते प्राणु = अपने चेत या होश में रह। आगमन = नागे, पहले से । (४) माया = माता । लच्छि = लक्ष्मी । कंथा गुदड़ी। कुरकुटा = मोटा कुटा ग्रन्न । दर = दल या राजद्वार। परिगह परिग्रह, परिजन, परिवार के लोग । (५) निशान , अंत म निदान। पोखि पोषण करके । साखी भर्राह = साक्ष्य या गवाही देते हैं । देख परेवा पक्षी की सी अपनी दशा देखी। कजरीबन कजलीवन। =