पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७६

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पदमावत

पदमावत दव बिरह दारुन हिय काँपा। खोलि न जाइ विरह दुख झाँपा ॥ उदधि समुद जस तरंग देखावा। चख महैि, मुख बात न आावा ॥ यह सुनि लहरि लहरि पर धावा। भंवर , जिउ थाह न पावा सखी यानि विष देह तो मरऊँ। जिउ न पियारमरे का डर खिनहि उठे, खिन वः आंस हि कंवल फेंकेत हार रामनहि लावहि, सबो ! गहन लेत १२ चेरी धाय सुनत खिन धाई। हीरामन लेइ छाईं बोलाई जनहु बैद औोषद लेइ आावा। रोगिया रोग मरत जिउ पावा सुनत असोस नैन धनि खोले। विरह बैन कोकिल जिमि बोले केंवलहि बिरह बिथा जस बाढ़ी। केसर बरन पीर हि गाढ़ी कित कंवलहि भा पेम शूरू । जो पै गहन लेहि दिन सूरू पुरइनि छह कंवल करी । सकल बिथा सुनि आंस तुम हरी पुरुष गंभोर न बोलह काहू। जो बोलहि तो और निबाहू एतवें बोल क्हत मुखपुनि होझ पुनि को चेत सँभारै? उहै कहत मुख सेत 1१४ और दगध का कहीं अपारा। सती सो जरें टिन अस झारा लका बुझौ नागि जौ लागी । यह न व झाइ ऑाँच बज्ागी कोई । लंकादाह लागू करे सोई जनह अगिनि के उठह पहारा । औी सब लागह अंग भंगारा । कटेिं कटि माँसू सराग पिरोवा । रकत के आंसु माँस सब रोबा। खिन एक बार माँसु नस भूजा। खिनहि चबाई सिंघ स पूजा एहि रे दगध ढंत उतिम मरी। दगध न सहिय जीउ बरु दी जहें लगि चंदन मलयगिरि औी सायर सब नीर सब मिलि प्राइ बुझावहि, है न नागि सरीर IIAI हीरामन जी देखेसि नारी। प्रीति बेल उपनी हि बारी कहे िकस न तुम्ह होह दुहेली। अरुझी पेम जो पीतम बेली प्रीति बेलि जिनि अरु कोई। रुके, मए न छूटे सोई प्रीति बेलि ऐसे तन डाढ़ा ॥ पलुहत सुखबाढ़त दुख बाड़ा प्रीति वेलि के अमर को बोई ?। दिन दिन बट्ट, छीन नहि होई प्रीति लि संग विरह अपारा । सरग पतार जगे तेहि झारा प्रीति के लि वेलि चढ़ि छावा। दूसर बेलि न सेंच पावा न वत है, पीसता है। झाँपा ढका था। फेंकेत = संकट गहन सूर्य रूप रत्नसेन का प्रदर्शन। (१४) भैरू के अंकुर। काबू कभी है। (१५) झारा झार, सराग = शलाका, सीख । जा गरजा दगध दाह उतिम = उत्तम। (१६) दुहेली = दु:खी । पहुँहत = पल्लवित होते, पनपते हुए