दवै बिरह दारुन हिय काँपा। खोलि न जाइ बिरह दुख झाँपा॥
उदधि समुद जस तरँग देखावा। चख घूमहिं, मुख बात न आवा॥
यह सुनि लहरि लहरि पर धावा। भँवर परा, जिउ थाह न पावा॥
सखी आनि विष देहु तौ मरऊँ। जिउ न पियार, मरै का डरऊँ॥
खिनहिं उठै, खिन बूड़ै, अस हिय कँवल सँकेत।
हीरामनहिं बुलावहि, सखी! गहन जिउ लेत॥ १२ ॥
चेरी धाय सुनत खिन धाई। हीरामन लेइ आइँ बोलाई॥
जनहु बैद ओषद लेइ आवा। रोगिया रोग मरत जिउ पावा॥
सुनत असीस नैन धनि खोले। बिरह बैन कोकिल जिमि बोले॥
कँवलहि बिरह बिथा जस बाढ़ी। केसर बरन पीर हिय गाढ़ी॥
कित कँवलहि भा पेम अँकूरू। जो पै गहन लेहि दिन सूरू॥
पुरइनि छाँह कँवल कै करी। सकल बिथा सुनि अस तुम हरी॥
पुरुष गँभीर न बोलहिं काहू। जो बोलहि तौ और निबाहू॥
एतनै बोल कहत मुख, पुनि होइ गई अचेत।
पुनि को चेत सँभारै? उहै कहत मुख सेत॥ १४ ॥
और दगध का कहौं अपारा। सती सो जरै कठिन अस झारा॥
होइ हनुवंत पैठ है कोई। लंकादाहु लागु करै सोई॥
लंका बुझी आगि जौ लागी। यह न बुझाइ ऑाँच बज्रागी॥
जनहु अगिनि के उठहिं पहारा। औ सब लागहिं अंग अँगारा॥
कटेि कटि माँसु सराग पिरोवा। रकत कै आँसु माँसु सब रोवा॥
खिन एक बार माँसु अस भूजा। खिनहिं चबाई सिंघ अस गूँजा॥
एहि रे दगध हुँत उतिम मरीजै। दगध न सहिय जीउ बरु दीजै॥
जहँ लगि चंदन मलयगिरि औ सायर सब नीर।
सब मिलि आइ बुझावहिं, बुझै न आगि सरीर॥ १५ ॥
हीरामन जौ देखेसि नारी। प्रीति बेल उपनी हिय बारी॥
कहेसि कस न तुम्ह होहु दुहेली। अरुझी पेम जो पीतम बेली॥
प्रीति बेलि जिनि अरुझै कोई। अरुझे, मुए न छूटै सोई॥
प्रीति बेलि ऐसै तन डाढ़ा॥ पलुहत सुख, बाढ़त दुख बाढ़ा॥
प्रीति बेलि कै अमर को बोई? । दिन दिन बढ़ै, छीन नहिं होई॥
प्रीति बेलि सँग बिरह अपारा। सरग पतार जरै तेहि झारा॥
प्रीति अकेलि बेलि चढ़ि छावा। दूसर बेलि न सँचरै पावा॥
दबैं = दबाता है, पीसता है॥ झाँपा ढका हुआ। सँकेत = संकट। गहन = सूर्य रूप रत्नसेन का अदर्शन। (१४) अँकूरू = अंकुर। काहू = कभी। (१५) झारा = झार, ज्वाला। सराग = शलाका, सीख। गूंजा = गरजा। दगध = दाह। उतिम = उत्तम। (१६) दुहेली = दु:खी। पलुहत = पल्लवित होते, पनपते हुए।