पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२९३

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(२७) पदमावती रत्नसेन भेंट खंड सात खड ऊपर कबिलासू । तहवाँ नारिसेज सुखबासू ॥ चारि खंभ चारिह दि िखरे। हीरा रतन पदारथ जरे । मानिक दिया जरावा मोतो । होइ उजियार रहा तेहि जोती ॥ ऊपर राता चंदवा छावा । औौ भुईं सुरंग बिछाव बिछावा ॥ तेहि महें पालक सेज सो डासी। कीन्ह बिछावन फूलन्ह बासी ॥ चहु ऑों गलसूई । कॉची ॥ दिस

िगेंडुवा ने पाट भरो "धुनि रूई

बिधि सो सेज रची केहि जोगू । को तहें पौढ़ि मान रस भोगू ? ॥ अति सुकुवाँरि सेज सो डासी, जुवै न पारे कोइ । देखत नवें खिनहैिं Tखन, पाव धरत कसि हाइ ॥ १ ॥ राजे तपत सेज जो पाई। गठि छोरि धनि सखिन्ह छपाई ॥ कहैं कुंवर ! हमरे मस चारू । नाज कुंवरि कर करब सिगारू ॥ हरदि उतारि चढ़ाउव रंगू। तब निसि चाँद सुरुज सओं संगू ॥ जस चातक मुख मूंद सेवाती। राजा चख जोहत तेहि भाँती ॥ जोगि छरा जन ठगे साथा। जोग हाथ कर भएछ बेहाथा। वै चातुरि कर लै अपसई मत्र अमोल छीति लेइ गई ॥ बैंच खोइ जरी श्री बूटी। लाभ न पाव, मूरि भइ टूटी ॥ खाइ रहा ठगला, तंत मंत वधि खोइ । भा बनखंडना सि नाव, न रोइ ॥ २ ॥ धौराहर प्रस तप करत गइड दिन भारी। चारि पहर बीते जुग चारा ॥ सभपुनि सखी सो ऑाई। चाँद रहा, उपनी जो तराई ॥ पूंछह ‘ रू कहां, रे चेला !। बिन ससि रे कस पर अकेला ? ॥ धातु कमाय सिखे त जोगी। अब कस भा निरधात बियोगी ? ॥ (१) पालक पलंग

। डासीबिछाई । तेंडुआा = तकिया। गलसूई

गाल के नीचे रखने का छोटा तकिया । काँची=गोटा पट्टा । पौढ़ि = लेटकर। सुकुवांरि = कोमल । (२) तपत : तप करते हुए । चारू = चाररीति, चाल । हरदि उतार = व्याह के लग्न में शरीर में जो हल्दी लगती है उसे छुड़ाकर। = । छरा = ठगा गया, खोया। कर == हाथ से । टटि रग गराग भइघाटा हुई । ठगलाड़ =विष या नशा मिला हश्रा लडड जिसे हुआा, हानि पथिकों को खिलाकर ठग लोग बेहोश करते थे । (३) चाँद रहा. .तराई पद्मिनी तो रह गईकेवल उसकी सखियाँ ही दिखाई पड़ी। निरधातु = निस्सर १८