पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२९५

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पदमावती रत्लसेन भेंट खंड ११३ पीर तुम्हारि सुनत भा छोटू । दैठ मना, होइ आस मोद न जोगौ फिर तपि करु जोगू । तो कहूँ कौन राज सुख भोगू ॥ वह रानी जहाँ सुख राजू । बारह प्रभरन करे सो सायूं जोगी दिढ़ आासन कर, अहांथर धरि मन ठाव । जो न सुना तौ अब सुनहि, बारह प्रभरन नावें प्रथमै मज्जन होइ सीरू। पुनि पहि तन चंदन चोरू ॥ साजि माँगि सिर सेंदुर सारें । पुनि लिलाट रचि तिलक संवार । पुनि नन्ह करै । नौ कडल कानन्ह महें पहरे ।। अंजन दुहु पुनि नासिक भल फूल अमोला। पुनि राता मुख खाइ तमोला। गिउ प्रभरन पहिगे जहूँ ताईं। ऑ पहि कर कंगन कलाई ॥ कटि द्रावलि भरन पूरा । पायन्ह पाहर पायल चूरा । बारह प्रभरन हैं बखाने । ते पहिरे बरही अस्थाने ॥ पुनि सोरहौ सिगार ज स, चारितु चौक कुलीन दौरव चारि, चारि लघ , चार सुभर चौ खीन ॥ ७ । पदमावति जो सँवा लोन्हा। पूनिई गति देउ ससि कीन्हा करि मज्जन तन कोन्ह नहानू । पहिरे चीर, गएछ छपि भानू । रचि पत्रावलि, माँग सरू। भरे मोति नौ मानिक रू ॥ चंदन चोर पहिर बव भाँती। मेघघटा बगपाँती चूंथि जो रतन माँग बैसारा। जानतें गगन टूटि निसि तारा। तिलक लिलाट धरा तस दोठा। जनदुइज पर सुहल बईठा ॥ कानन्ह कुंडल छंट औौ टी। जानहें "परी कचपची टूटी ॥ पहिरि जराऊ ठाहि , कहि न जाइ तस भाव । मानतें दरपन गगन भा, तेहि ससि तार देखाव ॥ ८ । देउ मनाउ ..मोहन ईश्वर को मना कि उसे (पद्मावती को) भी वैसी ही दया हो जैसी हम लोगों को तुझपर जा रही है । २. ग्रथों में जो बारह प्राभरण गिनाए गए हैं वे ये हैं --पुर, किकिणो, वलय, अंगूठो, कंकरण के अंगद, हार, कठभी, बेसरऊंट या बिरिया, टोका, सोसफल ग्राभरणों के चांर भेद कहे गए हैं--आावेयबंधनोयक्षेप्य, (जैसे कड़ा, अंगूठी) और आरोप्य ( से, हार)ाँ जायसी ने सोलह शृंगार गौर बारह नाभरण को बातें लेकर एक में गड़बड़ कर दिया है । (७) फूल =नाक में पहनने की लौंग । छुद्रावलि =क्षुद्घटिका, करधनी । च रा =कड़ा 1 चौक = चार चार का समूह । कुलोन = उत्तम । सुभर = शुत्र । (८) सँवारैशृंगार को । पत्रावली—=पत्नभंग रचना । दुइज = दूज का चंद्रमा। सुहल = सुहेल (अगत्स्य) तारा जो दूज के चंद्रमा के साथ दिखाई पड़ता है और आरवी फारसी काव्य में प्रसिद्ध है । धूट = कान का एक चक्राकार गहना । मानतें दरपन..देखाव=मानो आकाश रूपी दर्पण में जो चंद्रमा और तारे दिखाई पड़ते हैं वे इसी पद्मावती के प्रतिबिंब हैं । ।