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पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३०३

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पद्मावती रत्नसेन भेंट खंड

कुसुम माल असि मालति पाई। जनु चंपा गहि डार ओनाई॥
कली बेधि जनु भँवर भुलाना। हना राहु अरजुन के बाना॥
कंचन करी जरी नग जोती। बरमा सौं बेधा जनु मोती॥
नारँग जानि कीर नख दिए। अधर आमरस जानहुँ लिए॥
कौतुक केलि करहिं दुख नंसा। खूँदहिं कुरलहिं जनु सर हंसा॥
रही बसाइ बासना, चोवा चंदन के मेद।
जेहि अस पदमिनि रानी, सो जानै यह भेद॥ ३० ॥
रतनसेन सो कंत सुजानू। खटरस पंडित सोरह बानू॥
तस होइ मिले पुरुष औ गोरी। जैसी बिछुरी सारस जोरी॥
रची सारि दूनौं एक पासा। होइ जुग जुग आवहिं कबिलासा॥
पिय धनि गही, दीन्हि गलबाहीं। धनि बिछुरी लागी उर माहीं॥
ते छकि रस नव केलि करेहीं। चोका लाइ अधर रस लेहीं? ॥
धनि नौ सात, सात औ पाँचा। पूरुष दस ते रह किमि बाँचा? ॥
लीन्ह विधाँसि बिरह धनि साजा। औ सब रचन जीत हुत राजा॥
जनहुँ, औटि कै मिलि गए, तस दूनौ भए एक।
कंचन कसत कसौटी, हाथ न कोऊ टेक॥ ३१ ॥
चतुर नारि चित अधिक चिहूँटी। जहाँ पेम बाढ़ै किमी छूटी॥
कुरला काम केरि मनुहारी। कुरला जेहिं नहिं सो न सुनारी॥
कुरलहि होइ कंत कर तोखू। कुरलहि किए पाव धनि मोखू॥
जेहि कुरला सो सोहाग सुभागी। चंदन जैस साम कँठ लागी॥
गेंद गोद कै जानहु लई। गेंद चाहि धनि कोमल भई॥
दारिउँ, दाख, बेल रस चाखा। पिय के खेल धनि जीवन राखा॥
भएउ बसंत कली मुख खोली। बैन सोहावन कोकिल बोली॥
पिउ पिउ करत जो सूखि रहि, धनि चातक की भाँति॥
परी सो बूँद सीप जनु, मोती होइ सुख साँति॥ ३२ ॥
भएउ जूझ जस रावन रामा। सेज बिधाँसि विरह संग्रामा॥
लीन्हि लंक, कंचन गढ़ टूटा। कीन्ह सिंगार अहा सब लूटा॥


औनाई = झुकाई। राहु = रोहू। मछली। बरमा = छेद करने का औजार। नंसा करहि = नष्ट करते हैं। खूँदहिं = कूदते हैं। कुरलहिं = हंस आदि के बोलने को कुरलना कहते हैं।

(३१) बानू = वर्ण, दीप्ति, कला। गोरी = स्त्री। सारि = चौपड़। चोका = चूसने की क्रिया या भाव। चोका लाइ = चूसकर। नौ सात = सोलह श्रृंगार। सात = औ पाँचा बारह आभरण। पुरुष...बाँचा = वे शृंगार और आभरण पुरुष की दस उँगलियों से कैसे बचे रह सकते हैं। (३२) चिहूँटी = चिमटी। कुरला = क्रीड़ा। मनुहारी = शांति, तृप्ति। मोखू = मोक्ष, छुटकारा। चाहि = अपेक्षा, बनिस्बत।