पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३२१

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नागमती संदेश खंड १३t: रतनसेन क माइ सुरसती । गोपीचंद जसि मैनावती ॥ आंधरि बूढ़े होइ दुख - रोवा। जीवन रतन कहाँ दहें खोवा जीवन अहा लीन्ह सो काढ़ी। भइ बिनु टेक, करै क ठाढ़ी ? बिनु जीवन भइ आास पराई। कहाँ सो पूत खंभ होइ भाई ।॥ नन दीठ नहिं दिया बराहीं । घर चैंधियार पूत जो नाहीं । को रे चले सरवन के ठाऊँ। टेक देह औी दे के पाऊँ। तुम सरवन होइ काँवरि सजा। डार लाइ अब काहे तजा ? सरवन ! सरवन !' रर , माता काँवरि लागि । तुम्ह बिनु पानि न पावै, दसरथ लावे आागि ॥ ४ ॥ लेइ सो फंदेस बिहंगम चला। उठी आागि सगॐ सिंघला ॥ बिरह बजागि बीच को ठेचा ? । धूम सो उता साम भए मेघा । मरिगा गगन लूक अस छूटे । हौ सब नखत प्राइ भुईं टूटे ॥ भा रहूं । बिरह के दाथ भइ जनु खx I। राहु केतु, जब लंका जारी । विनगी उड़ी चाँद महें परी । जाइ विहंगम समुद डफारा। जरे मच्छ पानी भा खारा । दाधे बन बीहड़जड़सीपा। जाइ निअर भा सिंघलदीपा समुद तीर एक तरिवरजाइ बैंठ तेहि रूख जौ लगि कहा ठंदेस नहनहि पियासनहि भूख ॥ ५ । (४) खंभ सहारा । बराहीं = जलते हैं । सरवन – श्रमणकुमार’ जिसकी । कथा उत्तरापथ में घर घर प्रसिद्ध है । एक प्रकार के भिखमंगे सरवन मातृ--भक्ति की कथा करताल बजाकर गाते फिरते हैं । यह कथा वाल्म दश रथ ने। रामायण में दशरथ ने अपने मरने से पहले कौशल्या से कही खेलते समय एक वद्ध तपस्वी के पत्र को हाथी के धोखे। में मार डाला था। वह लेने आाया मुनिपुत्र अंधे वृद्ध माता पिता के लिये पानो । था । वृद्ध मुनि ने दशरथ को शाप दिया कि तुम भ। । पुलवियोग में मरोगे में भी है। दशरथ नाम न देकर यही कथा बौद्धों के ‘सामजातक' श्राई । पर उसमें अंधे मुनि पूर्ण उपासक कहे गए हैं और उनके जी उठने की बुद्ध के बात है । माथण में 'श्रमणकुमारशब्द नहीं भाया है, केवल मुनिपुत्र लिखा है । परइस कथा का प्रचार बौद्धों में अधिक ह आा, इसी से यह सरवन' अर्थात ‘सरवन श्रमण (बौद्ध भिक्षु) की कथा के नाम से ही देश में प्रसिद्ध है । ' के आभास इस गीत गानेवाले प्रारंभ में एक प्रकार के बौद्ध भिक्षु ही थे । इसका बात से मिलता है कि सरवन के गानेवाले के लिये अभी थोड़े दिन पहले तक यह नियम था कि वे दिन निकलने के पीछे न मुंह अंधेरे की माँग करेमाँग लिया। करे । काँवरि = वाँस के डंडे के दोनों छोरों पर बंधे , हुए झावेजिनमें तीर्थयात्री लोग गंगाजल आदि लेकर चला करते हैं (सरवन अपने माता पिता को कांवरि में बैठाकर ढोया करते थे) । (५) ठेघा = टिका, ठहरा। उफारा = चिल्लाया ।