पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३३०

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१४८
पदमावत

१४८ धन नक्षत्र से चंद्रमा औ तारा बल सोइ । समय एक दिन गवनें लछमी केतिक होइ ॥ १२ ॥ पहिले चाँद पुरुब दिसि तारा । दूजे बस इसान बिचारा । तीजे उतर ऑौ चौथे बायब । पचएँ पच्छितें दिसा गनाइब छठएँ नैऋतदक्खिन सतएँ। बसें जाई अगनिर्दी सो अटए ।। नवएँ चंद सो पृथिवी बासा । दसएँ चंद जो रहै अकासा ॥ ग्यारहें चंद पुरुब फिरि नाई । बहु कलेस सॉ दिवस विहाई ॥. सुनी, भरनि, रेवती भली। मृगसिर, मूलपुनरबसु बली ॥ पुष्य, ज्येष्ठा, हस्त, अनुराधा। जो सुख चाहें पूज़ साधा । तिथि, नछत्र औौ बार एक, अस्ट सात खंड भाग। ग्रादि अंत ध सो एहि, दुख सुख ग्रंकम लाग 1१३॥ परिवा, बुद्धि, एकादसिस नंदा । दुइज, सत्तमी, द्वादसि मंदा । | तोज, आस्टमी, तेरसि जया। चौथि चतुरसि नवमी खया ॥ पून पूनिऊँदसमी, पाँचे । सुझे , व ये नावें अदित साँ हस्त नखत सिधि लहिए। बीके पुष्य नवन ससि कहिए । भरनि रेवती बुध अनुराधा। भए अमावस रोहिनि साधा ॥ राह चंद्र भ संपति आाये । चंद गहन तब लाग सजाये । सनि रिक्ता कुज प्रज्ञा ली । सिद्धि जोग गुरु परिवा की ॥ छठे नछत्र होइ रवि, मोहि अमावस होइ । बीचहि परिवा जी मिल सुरुज गहन तब होइ I१४। 'चलह चल’ भा पिउ कर चालू । घरी न देख लेत जिउ कालू ।॥ समदि लोग पुनि चढ़ी बिवाना। जेहि दिन डरी सो श्राइ तुलाना । रोवहि पिता श्री भाई । कोड न टेक जौ कंत चलाई ॥ मात रोवहि सब नैहर सिंघला । लेइ बजाइ के राजा चला । तजा राज रावन का केह ? छड़ा लंक विभीषन लेते। भरी सखी सब कैटत फेरी। अंत कंत साँ भयेड गुरेरा ॥ कोउ काह कर नाहि निशाना । मया मोह बाँधा अरुझाना ॥ कंचन कया सो रानी, रहा न तोला माँसु । कंत कसौटी घालि के, बूरा गई कि हाँसु 1१५। । (१४) नंदा = ग्रानंददायिनी, शुभ । मंदा = प्रशभ । जया = विजय देनेवाली। खया = क्षय करनेवाली । सन रिकता = शनि रिक्ता, शनिवार रिक्ता तिथि या खाली दिन । (१५) समदि = विदा के समय मिलकर (समदन बिदाई, जैसे पितसमदनअमावस्या) । , नाइ तुलाना = जा पहुँचा। टेक = पकड़ता है । का केढ = और कोई क्या है ? गुरेरा =देखा देखी, साक्षात्कार । निशाना = निदान, अंत में । चूरा = कड़ा। हासु = हंसली नाम का गले का