पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३४०

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१५८
पदमावत

१५८ कहि उठा समद पाँ आावा। काढ़ि कटार गीउ महें लावा ॥ कहा समुदपाप अब । बाम्हन परगटा ॥ घटा रूप श्रा तिलक दुवादस मस्तक कीन्हे । हाथ कनक बैसाखी लीन्हे मुद्रा नवन, जनेऊ काँधे । कनकपत्र धोती तर बाँधे ॥ पाँवरि कनक जराऊँ पाऊँ। टीन्हि असीस प्राइ तेहि ठाऊँ। कहसि कुंवर ! मोसवें सत बाता । काहे लागि करसि प्रपघाता। परिहंस मर िकि कौनिउ लाजा। नापन जीउ देसि केहि काजा ॥ जिनि कटार गर लावति, सम िदेख मन प्राप। सकति जीउ जौ काले, महा दोष श्री पाप 1१३। को तुम्ह उतर दे, हो पाँड़े । सो बोले जाकर जिउ भाँड़े। जबूदीप केर हौं के राजा। सो मैं कीन्ह जो करत न छाजा ॥ सिंघलदीप राजघर बारी। सो मैं जाइ बियाही नारी ॥ बहु बोहित दायज उन दीन्हा। नग अमोल निरमर भरि लीन्हा ॥ रतन पदारथ मानिक मोती। हुती न काहू के संपति मोती ॥ बहल, घोड़हस्ती सिंघली । औौ सँग कुंवरि लाख दुइ चली ते गोहने सिघल पदमिनी। एक सो एक चाहि पमनी ॥ पदमावति जग रूपमनि, कहें लगि कहीं दुहेल । तेहि समुद्र मुंह खोएऊँ, हौं का जि अकेल 1१४। । हँसा समुदहोइ । जग ॥ उठा अंजोरा व डा सब कहि कहि मोरा’ तोर होइ तोहि मरे न बेरा । अकि बिचारि त: केहि के ॥ हाथ मरोरि धुनै सिर झाँखी। मै तोहि हिये में उपजे खी बहुत प्राइ रोड सिर मारा। हाथ न रहा झूठ संसारा ॥ जो जगत होति फुर माया । सैतत सिद्धि न पावत, ॥ राया ! सिडे दरब न सैता माड़ा। देखा भार चमि के छाँड़ा। पानी के पानी महें गई। तू जो जिया कुसल सब भई जा कर दीन्ह कया जिउलेइ चाह जब भाव । धन लछिमी सब ताकर, लेई त का पछिताव ? । । १५ श्रपाँड़े ! पुरुषहि का हानी। जौ पावधे पदमावति रानी न, (१३) पाप अब घटा = यह तो बड़ा पाप मेरे सिर घटा चाहता है । बसाखा = लाठी । = खड़ाऊँपाऊँ। पाँवरि । = पाँव में काहे लगि = किसलिये । आपघात : आत्मघात । परिहस = ई में. शरीर में । ओोती = उतनी चाहि ‘ प्य। (१४) तुम्ह = तु । भड़ = घट । = बढ़कर। रूपमनी = रूपवती । दुहेल = दुख । = होता तेरा बेड़ा तुझसे दूर (१५) तोर होड़ - बेरा तेरा तो न होता। झाँखी = भीखकर। उधर = खुलती । है । सिद्धिराया सैंतत = तो हे तुम द्रव्य संचित करते हुए सिद्धि पा न जाते पानी गई जो वस्तुएँ (रत्न ग्रादि) पानी की थी वे पानी में गई । चाह लेइ = लिया ही चाहे । जब भाव = जब चाहे । (१६) अनु = फिरमागे ।