पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३४७

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चित्तौर आागमन खंड १६५ कहतहि बात सखिन्ह सौ, ततखन मावा । भट राजा श्राइ नियर भा, मंदिर बिछावह पाट ॥ ३ ॥ सुनि तेहि खन राजा कर नाऊँ। भा हुलास सब ठाँवह ठाऊँ। पलटा जनु बरषा ऋतु राजा। जस साढ़ थाने दर साजा । देखि सो छल भई जग छाहाँ । हस्ति मेघ श्रोनए जग माहाँ ॥ सेन पूरि चहें भाई घन घोरा। रहस चाव वरसे ओोरा ॥ धरति सरग अब होइ मेरावा। भर्ती सरित नौ ताल तलावा उठी लहकि महि सुनतदि नामा। ठाँवहि ठाऍ व घस जामा ।। दादुर मोर कोकिला बोले । हत जो अलोप जो सब खोले । होइ असवार जो प्रथमे मिले चले सब भाई । नदी अठारह गंडा भिलों स मुद कहें जाइ ॥ ४ ॥ बाजत गाजत राजा नगर दिसि बाज । ॥ ग्रावा। चहें बधावा बिसि प्राइ माता सी भिला। राम भंटी कौसिला जाइ । मंदिर बंदनवारा। होइ लाग बह मंगलारा । पदमावति कर आब जिउ आलू बेवान् । नागमती महें भा ॥ दीन्ह उतारा सही न जाइ सवति के झारा। दुसरे मंदिर । भई उहाँ चहें खंड बखानी। रतनसेन पदमावति जानी। पुहु गंध संसार महूँरूप बखानि न जादू । हेम सेत जन उघरि गा, जगत पात फहराइ ॥ ५ ॥ बैठ सिंघासनजोहारा निधनी निरगुन दरव लोग । बाहारा ॥ गनित निवर में गतन्ह दे दान कीन्हा। दान बहत दीन्हा ॥ लेइ के हस्ति महाउत मिले। तुलसी लेइ ॥ उपरोहित चले टा जत आवहैिहसि ऐंसि राजा कट लगाबहि ॥ भाइ कुंवर । नेगी गए, ले मिले अरकाना । पंवईि बारी घहरि निसाना । मिले , कापर पहिराए। देह दरव तिन्ह घर्राह पठाए कुंवर सब के दसा फिी प्रनि दुनी। दान डग सबहो जग सुनी । _। (४) दर - दल । रहस चाव = नंद उता । लकि = उठी लहलहा उठी । हु = थे । अठारह गंडा नदो = अवध में जन साधारण के बोच यह प्रसिद्ध है कि समुद्र में अठारह गंडे (अर्थात् ७२) नदियाँ मिलतो हैं। (५) बेवानन विमान । जिउ महें भा आान = जो में कुछ और भाव हुआा। झार = (क) लपट, (ख) ईष्र्या, डाह । जौ = जव । उतारा दो। - उतारा। हेम सेत = सफेद पाला या बर्फ । (६) बहत के = बहुत सा। जतजितने । अरकाना= अरकाने दौलत, सरदार, उमरा। दुनी = दुनिया में । डॉग == डंका ।