पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३५९

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राघवचेतन देशनिकाला खंड १७७ तेइ हँकारि मोहि कंकन दीन्हा । दिस्टि जो परी जीउ हरि लीन्हा ॥ नैन भिखारि ढोठ सतड़ा। लागे तहाँ बान होइ गड़ा नैनहि नैन जो वेधि समाने । सोस धुनें निसह नहि ताने ॥ नवहि न नाए निलज भिखारी। तबह न लागि रही मुख कारी॥ कित करमुहे नैन भएजीउ हरा जैहि बाट । सरवर नीर निछोह जिमि दरकि दरकि हिय फाट ॥ ए ॥ सखिन्ह कहा चेतसि विसंभारा। हिये चेतु जेहि जाति न मारा । जौ कोइ पावे प्रापन माँगा। ना कोइ मरेन काह खाँगा । वह पदमावति ग्राहि अनूपा । बरनि न जाइ काहू के रूपा ॥ जो देखा सो गुपुत चलि गएछ । परगट कहाँ, जीउ बिनु भएड ॥ तुम्ह आस बहुत बिमोहित भए।धुनि मुनि सीस जीड देखे गए। बहर्नान्ह दीन्हें नाइ के गोवा। उतर देइ नहि, मारे जीवा तुर्दा पे मरह होइ जरि भूई । अबई उवेलु कान के रूई ॥ कोइ माँगे नहि पावेकोइ माँगे बिनु पाब । तू चेतन औरहि समु' , तोकद को समुझाव ? 1१०। 'भए चेत, चित चेतन चेता। बहरि न प्राइ सहीं दु:ख एता ॥ रोवत श्राइ परे हम जहाँ। रोवत चलेकौन सुख ताँ ?! जहाँ रहे संसौ जिउ के रा। कौन रहनि ? चलि चलै सबेरा ॥ अब यह भीख तहाँ होइ माँगों। देइ एत जेहि जनम न खगों । प्रस कंकन जौ पावों दूजा। दारिद , आास पूजा हरेंमन । दिल्ली नगर आादि तुरकानू । जहाँ , . अलाउद्दीन सुलता। सोन ढ जेहि के टकसाओं । बारह बानी चले दिनारा ॥ कंवल ब खानी जाइ ततें जद अलाउद्दीन अलि । सुनि के चढ़ भानु होई, रतन जो होइ मलीन ११ । दकारि ठ व लाकर । छोड़नेवाला। सतछा = सत्य ताने = खींचने से । तबहि न कारो = तभी न (उसी कारण से) आंखों के मुंह में कालिमा (। नोरफाट । काली पुतली) लग रहो हैसरवर = तालाब के सूखने पर उसकी जमोन में चारो ओोर द रारें सो पड़ जाती । (११बरनि न जाइ"रूपा हैं ) = धा किसो के साथ उसकी उपमा नहीं दी जा सकतो । भूई = सरकडे का । इतना उघेलु रूई = सुन प्रौर चेतकरकान को रूई खोल । (११) एता = । संस = संशय । कौन रहनि = वहाँ का रहना क्या ? देइ एतखांगों = इतना दो कि फिर मझ कमी न हो। सोन ढ = सोना ढलता है, सोने के सिक्के ढाले जाते हैं। । बारहबानी = चोखा। दिनारा = दोनार नाम का प्रचलित सोने का सिक्का । अलि : भौंरा ।