पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३८७

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राजा बादशाह युद्ध खंड २०५ छवी राग गाबहि पातुरनी । श्री पुनि छत्तीसौ रागिनी ॥ औौ कल्यान कान्हरा न होई। राग बिहाग केदारा सोई ॥ परभाती होझ उठे बैंगाला। आासावरी राग गुनमाला ॥ धनासिरी औौ सूहा कोन्हा। भएउ बिलावलमारू लीन्हा ॥ रामकली, नट, गौरी गाई ।धुनि खंमाच सो राग सुनाई । साम गूजरी पुनि भल भाई । साएँग ऑौ बिभास मुंह माई पुरबी, ” सिंधी देस बरारी टोड़ी गौड़ सौ भई निरारी ॥ सवें राग श्री रागिनी सुरै अलापग्रह ऊच तहाँ तीर कहें पहुँचे दिस्टि जहाँ न पहुँच ? ॥ १४ ।। जहँवाँ सौंह साह के दीठी पातुरि फिरत दीन्ह तm पीठी ॥ देखत साह सिंघासन "जा । कब लगि मिरिच चाँद तोहि त्रेजा' । छाँहि बान जाहि उपराही । का गरब करसि इतराही ? ॥ बोलत बान लाख भए ऊँचे । कोइ कोट, कोइ पौरि पहुँचे । जहाँगीर कनउज कर राजा। मोहि क वान पातुरि के लागा । बाजा बान, जाँघ तस नाचा। जिउ गा सरगपरा भुईं साँचा ॥ उड़सा नाचनचनिया मारा। रहसे तुरुच बजाइ के तारा ॥ जो गढ़ सार्जे लाख दसकोटिा उठावे कोट । बादशाह जब चाहें छपे न कौनिउ प्रोट II १५ ॥ राजे पौरि प्रकास चढ़ाई परा बाँध चहें फेर लगाई । सेतु बंध जस राघव बाँधा। परा फेर, भु ईं भार न काँधा ॥ हनुवंत होइ सब लाग गोहा। चहें दिसि ढोई ठोई कोन्ह पहा ॥ सेत फटिक अस लारें गढ़ा । बाँध उठाइ चढ़ गढ़ मढ़ा ॥ वेंड फंड ऊपर होइ पटाऊ। चित्न अनेक , अनेक कटाऊ ॥ सोढ़ी होति जाहि बह भौंती । जहाँ चढ़े हस्तिन के पाँतो ॥ भा गरगज कस कहत न आावा। जन उठाइ गगन लेइ आावा ॥ राह लाग जस चाँदहि तस गढ़ लागा बाँध । सब आागि आस बरि रहा, डाँव जाइ को काँध ? : १६ ॥ राजसभा सब मरे बईठी । देखि न जाइ, दि गइ दोठी ॥ (१४) पहुँच = पहुँचती है । (१५) फिरत=फिरते हुए। सिंघासन = सिंघासन पर । ग जा = गरजा। मिरिग = मृग अर्थात् मृगनयनो। भूजा भोग करेगा १. पाटiतर-‘‘चाँद, सूर भा भूजा' अर्थात् चंद्रमा तो नाच देखे औौर सूर्य भुजवा हो गया कि उसको घोर पोठ फेरो जाय। (१५) भए ऊँचे से ऊपर की ओोर चलाए गए। साँचा = शरीर उड़सा भंग हो गया । तारा=ताल, ताली। (१६) अकास चड़ाईवे पर बनवाई । चलें फेर लगाईचारों ओोर लगाकर । मढ़ा -- घेरा। पटाऊ पटाव । गगन लइ = आकाश तक । ठाँव.काँध=उस जगह जाने का भार कौन ऊपर ले सकता है ? १७) मढूं = करने के लिये । (सलाह