पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३९०

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पदमावत

२० ८ बरिस साठ लगि साँठि न खाँगा । पानि पहार चवें विन मोंगा It तेहि ऊपर जी पै गढ़ टूटा । सत सकबंघी केर न छूटा सोरह लाख कुंवर हैं मौरे । परह पतंग जस दीप अंजौरे ॥ जहि दिन चाँचार चाहाँ जोरी । समद फागू, लाइ के होरी ॥ जो निसि बीच, डरे नह कोई । देख तो काल्हि काह दर्द होई' ॥ अबहीं जौहर साजि है, कीन्ह चहीं उजियार । होरी खेल रन कठिन, कोई समेटे छार ॥ ३ । ।। अनु राजा सो जरें निशाना । बादशाह के सेव न माना बहुतन्ह अस गढ़ कीन्ह सजवना । अंत भई लंका जस रवना जेहि दिन वह के गढ़ घाटी । होइ अन्न श्रोही दिन माटी तू जानसि जल चुवे पहारू । सो रोवे मन सँवरि स घारू ।॥ सूतह सूत मुंवरि गढ़ रोवा कस होई हि जो होइहि ढोवा ॥ रांवरि पहार सो ठारे ऑाँसू । पै तोहि सूझ न यापन नासू ।। श्रा काल्हि चाहै गढ टूटा । अबढ़े मानु जी चाह िछूटा ॥ हैं जो पाँच नग तो पहें लेइ पाँचो कहें भेंट । मऊ सो एक गुन माने, सब ऐगुन धरि मेट ll है । अनु । बादसाह सरजा को मे पारा बड मुहै तुम्हारा । ऐगुन मेटि सके पुनि सोई औौ जो कीन्ह चह स होई नग पाँचों दे देहूं भंडारा । इसकंदर सों दारा । जौ यह वचन त माथे मोरे । सेवा कॐ ठाढ़ कर जोरे ॥ पे बिनु सपथ न घस मन माना । सपथ बोल बाचा परवाना । खंभ जो गरुन लीन्ह जग भारू । तेहि क बोल नह टरै पहारू ॥ नाब जो माँ भार ढंत गीवा। सरजे कहा मंद वह जीवा । साँटि = समान । खाँगा = कम होगा । समदर्शी = विदा के समय का मिलना सिन् । जो निसि बीच..दर्दी होई = (सरजा ने जो कहा था कि ‘देख काल्हि गढ़ टूट' इ सके उत्तर में राजा कहता है कि ) यदि रात बीच में पड़ती है (भी रात भर का समय है) तो कोई डर की बात नहीं; देख तो कल क्या होता है ? १. पाटांतर-देइके घरनि जो राखें जीऊ । सो कस आापुहि कहैि। सक पीऊ | (४) अनु = फिर । सजवना = तैयारी। रवना = रावण । अन्न । माटी होड़ = खाना पीना हराम हो जायगा। । = । ढोवा . संघा सहार, नाश लूट। मछ सो एक गुनमेट = शायद वह तुम्हारे इस एक ही गुण से सब अवगुणों को भूल जाय । (५) को मे पारा = इस बात को कौन मिटा सकता है कि। डारा = भंडार से । जौ यह बचन = जो बादशाह का इतना ही कहना है सिर तो मेरे माथे पर है । बाचा परवाना = बचन का प्रमाण है । माँझ.= नाव जो .गीवा। जो किसी बात का बोझ अपने ऊपर लेकर बीच में गरदन हटाता है ।