पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४०१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


चित्तौरगढ़ वर्णन खंड २१. सुनावा, 'लाग दुहुन जस लोन आाए कोहाइ भंदिर , सिंघ छान अब गोन राजा के सोरह से दासी तिन्ह महें चुनि काढ़ी चौरासी सारो पहिाई। निकसि मंदिर में सेवा आई जनु निसरी सब बीरबहूटी। रायमुनी पींजर हृत छूटी परथमें जोबन सो नयन बान श्र सारंग भौहैं। मारह धनक फेरि सर ओोही। पनिघट घाट धनुक जिति मोही काम कटाछ हनहि चित हरनी । एक एक में नागरि बरनी जानतें इंद्रलोक में काढ़ी। पाँतिहि पाँति ई सब ठाढ़ी साह पूछ राघव पहूँए सब अठरी माह तुइ ज पदमिनि बरनी, कटु सो कौन इन माहि दीरथ , भूमिपति भारी। इन महें नाह पदमिनि नारी ॥ यह फलवारि सो मोहि के दासी। कहें केतकी भंवर जहूँ वासी वह तो पदारथ, यह सब मोती। कहें श्रोहि दीप पौंग जेहि जोती ए सब तरई सेव कराहों । कहें वह ससि देखत छपि जाहीं जी लगि सूर के दिस्टि अकासू । तौ लगि ससि न करे परगास ॥ सुनि के साह दिस्टि तर नावा। हम पाहुन, यह भंदिर परावा ऊपर हे नाहीं। हना राहु अर्जुन परशाहीं तपे बीज जस धरती, सूख विरह के घाम कब सुदिस्टि सो बरिसेतन तरिवर हो जाम 1१ सेव करें दासी चहें पासा। अब्री मनहें इंद्र कविलासा कोउ परात कोउ लोटा लाईं । साह सभा सब हाथ धोवाई कोई धागे पनवार बिछावह । कोई लैवन लेइ लेइ प्रावह माँड़े कोइ जाहि धरि जूरी । कोई भात परोसह पूरी , लोन जस लाग = अप्रिय लगr, बुरा लगा कोहाइ.=रूटकर। मंदिर अपने घर । छान बाँधती गोन रस्सी । सिषः‘गोन । सिह अब रस्सी से बँधा चाहता है । (६) रायमुनी = मुनिया नाम की छोटी सुंदर चिड़िया । सारंग धनष (१०) नाउ = आयु। कहूँ केतको ‘बासी = वह केतकी यहां कहाँ है (अर्थात नहीं है) जिसपर भरे बसते हैं । पदारथ = रत्न जो लगि सूर - परगान जब तक सूर्य ऊपर रहता तब तक चंद्रमा का उदय नहीं होता; अर्थात् जब तक आपको दृष्टि ऊपर लगी रहेगी तब तक पद्मिनी नहीं जाएंगी हे = देखता है हना राहु अर्जुन पाहीं = जैसे अर्जुन ने नीचे छाया देखकर मत्स्य का वध किया था वैसे ही आपको किसी प्रकार दर्पण आदि में उसकी छाया देखकर ही उसे प्राप्त करने का उद्योग करना होगा सूखता है ! (११) पनवार = बड़ा पत्तल । माड़े = एक प्रकार की चपाती। जूरी = गड्डी लगाकर