पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४११

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पद्मावती नागमती विलाप खंड २२९ नागमतिदि पिय पियरट लागी। निसि दिन तपे मच्छ जिमि नागी । भंवर, भुजंग कहाँ, हो पिया। हम टेघा तुम कान न किया । भूलि न जाहि कंबल के पाहाँ न ॥ । बाधित बिलंब लागे नाहा कहाँ सो सूर पास ही जानें। बांधा भंवर छोरि के लाऊँ।। कहाँ जाउ को कहै संदेसा। ? जाढ़े सो त, जोगिन के भेसा ॥ फारि पटोरहि पहिशें कंr। जो मोहि कोड देखावे पंथा वह पथ पलकन्ह जाइ बोहागें । तीस चरन के तहाँ सिधारों !। को गुरु अगुवा होइ, सखि! मोहि लावे पथ मह । तन मन धन बलि बलि कीं, जो रे मिलावै नाह ॥ ४। कारन रोड़े मोतिन्ह माला वाला। जनु टूटह के । गवत न साँस सँभारा। नैन चर्वाहि जस मोरति धारा। भई जाकर रतन परं पर हrथा। सो अनाथ किमि जीवे, नाथा ! ॥ पाँच रतन श्रोति रतनहि लागे । वे गि आाडपिंय रतन सभागे ! ॥ रही न जोति नैन भए खोने सन न सुनों, न तुम लोने ॥ रसनहि रस नह एक भावा। नासिक और बास नहि आवा॥ तचि तचि तुम्ह बिनु अंग मोहि लागे । पाँचो दगधि विरह अब जागे। विरह सो जारि भसम है, चहै उड़ग्बा खेह । आाइ जो धनि पिय मेवेकरि सो देइ न इ देह ॥ ५ ॥ पिय बिनु व्याकुल विलसे नागा। बिरहा तपनि साम भए कागा ॥ पवन पारीन कहें सोतल पोऊ ? । जेहि देबे पलु है पन जीऊ ॥ कह सो बास मलयगिरि नाहा । जेहि कल परति देत गलबाहाँ ॥ पदमिनि ठगिनि भई कित साथा। जेहि में रतन परा पर हाथा ॥ होइ बसंत श्रावह पिय केसरि। देखे फिर फ्लै नागेसरि॥ तुम्ह बि, नाह ! रहै हि तचा। अब नहि बिरह गरुड़ सों बचा ॥ अब अंधियार परामसि लागी । तुम्ह बिनु कौन बुझाने आगी ? ॥ नन, नवन, रस रसना सब जोन से भएमाह । कौन सो दिन जेहि भटि के, ग्राई करे सुख छाँह ॥ ६ ॥ (४) ग्रागी = आग में । टेवा = सहारा या आश्रय लिया। र = भौंरे का प्रतिद्वंद्वो सूर्य। बोहारों = झाड़ लगाऊँ। सील चरन है = सिर को पैर बनाकर अर्थात् सिर के बल चलकर। (५) कारन _ काण्यकलाविलाप (अवधी) । औोरति = औोलती । पाँच रतन = पाँचों इंद्रियाँ । औोहि रतनहि लागे = उस रत्नसेन की घोर लगे हैं । तचि तचि = जलजलकर, तपते से । पाँचो = पाँचों इंद्रियाँ। (६) नागा = नागमतो । गरुड़ = गरुड़ जो नाग (यहाँ नागमती) का शत्रु है।