पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४१६

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२३४
पदमावत

२३४ हिया फार कुर तेहि केरा। सिंधहि तजि सियार मुख हेरा ॥ जोबन नीर घटे का घंटा ?। सत्त के बर जौ नहि हिंय फटा ॥ सघन मेघ होड़ साम बरीसह । जोबन नव तरिवर होइ दोसहि ॥ रावन पाप जो जिज , दुवी जगत मुह कार । राम सत्त जो मन धराताहि छड़े को पार ? ॥ ११ ॥ कित पावसि पुनि जोबन राता। मैIत, चढ़ा साम सिर छाता ॥ जोबन बिना बिधि होइ ना। बिन् जोबन था सब ठाऊँ। जाबन हेरत मिलै न हेरा। सो जौ जाइ, करै नहि फेरा ॥ है जो कस नग तंवर जो बसा। शनि वग होfिह, जगत सब हंसा ॥ सेंवर सेव न चित कर सुना। पुनि पछिताति ग्रंत जब भूचा ॥ रूप तोर जग ऊपर लोना। यह जोबन पाहन चल होना ॥ भोग विलास केरि यह वेरा । मानि लेह, पुनि को केहि केरा ? । उठत कोंप जस तरिवर, तस जोवन तोहि रात । तो लगि रंग लेहु रचि, पुनि सो पियर होझ पात 1 १२ ॥ कुदिनि न सुनत हिय जरो। पदमिनि उरह आागि जनु परी ॥ रग ताकर ही जारी काँचा। आापन तजि जो पराएहि रचा। दूसर दुइ बाटा । राजा दुइ न होहि पाटा ॥ कर जाइ जेहि प्रति दिढ़ होई। मुख सोहाग सौ बंट साइ ॥ एक के जो जोबन जाउ, जाड सो भंवरा, पिय के प्रीति न जाईसो सँवरा ॥ एहि जग जो पिछ करहि न फेरा। मोहि जग भिलह जौ दिन दिन हेरा ॥ जावन मार रतन जहें पीऊ। बलि तेहि पिउ पर जोधन । जीऊ भरथरि विरि सिंगला, ग्राहि करत जिउ दीन्ह । हों पासिनि ा जियत हां, इहै दोष हम कोन्ह 11 १३ पदसावति ! सो कौन रसोई । जेहि परकार न दूसर होई ॥ रस दूसर जेहि जोभ बईठा । सो जानै रस स्नाटा मोr । फार = फाड़े । सत के..फ यदि सत्य के बल से हृदय न फटे अथत् िप्रीति । में अंतर न पड़े (पानो घटने से तल की जमीन में दरारें पड़ जाती हैं) छरें को पार = कौन छल सकता है। (१२) राता = ललित । साम सिर छाता : = अर्थात् काले केश = । थाके थक जाता है । = बगल के समान शत्रत । चल होना = चल देनेवाला बग है । कोंप = कोंपलकल्ला। रंग लेटु रचि = (क) रंग लो, (ख ) भोग विलास कर ली । (१३) काँचा = क चा। रॉचा = मनुरक्त हुआा। जाइ दुइ बाटा = दुर्गति को प्राप्त होता है । जाउ = चाहे चला जाय । । भंवरा । = काले केश सव जिसका किया करती हूं। हेरा = स्मरण जौ दिन = यदि लगातार ढ ढ़ती रहूंगी। (१४) कौनि रसोई =किस काम की रसोई है ! जहि परकार..हाई = जिसमें दूसरा प्रश्रकार न हो, जो एक हो प्रकार की हो। ।