पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४२४

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२४२
पदमावत

२४२ पृहुमि पूर्ति सायर दुख पाटा । कौड़ी केर बेहरि हि फाटा ॥ बेहरा हिये खजूर के बिया । बेहर नाहि मोर पाहन हिया ॥ पिय जेहि लैदि जोगिनि होड़ धावों । हौं बँदि लेगेंपियह मुकरावों ॥ सूरज गहन गरासा, कंवल न ट पाट । पंथ तेहि गवनव, कंत गए जेहि बाट। गोरा बादल दोउ पसीजे । रोवत हिर बडि तन भी ।। हम राजा सर्वे इहै कोहाँने । तुम न मिल, धरिहैं तुरकाने जा मति सुनि हम गए कोहाँई । सो निग्रान हम्ह माथ श्राई ॥ जौ लगि , नहि भागह दौऊ। स्वामि जियत कि जोगिनि होऊ ॥ उए अगस्त हस्ति जब गाजा। नीर घटे घर प्राहि राजा ॥ बरषा गएअगस्त जौ दीटिहि। परिहि पलानि तुरंगम पीटिहि ॥ बंधों राहु, छोड़ाव, सूरू । रहै न दुख़ कर मूल चूरू । सोई सूर, तुम ससहर, यानि मिलावों सोह । तस दुख सुख उप, "नि माँह दिनि हो मह लीन्ह पान बादल श्री गोरा। ‘कहि लइ देऊँ उपम तुम्ह जोरा ? ॥ तुम सावंतन सरवरि कोऊ। तुम्ह अँगद हनुवंत सम दोऊ। तुम रजुन भीम झवारा। तुव बल रन दल मंडनहारा ॥ तुम टारन भारह जग जाने बखान ! । तुम सुपुरुष जस करन तुम बलवीर जैस जगदेऊ। तुम संकर श्री मालकदेऊ तुम अस मोरे बादल गोरा। काकर मुख हेणे, बेंदिशोरा ? ॥ जस हनुवैत राघव वैदि छोरी। तस तुम छोरि मेरावह जोगी जैसे जरत। लखाघर, साहस कीन्हा भीगें । जरत खंभ तस , के पुरुषारथ जीज राम लखन तुम तुमहीं घर . बलभद्र भुवारा ॥ दंत संघारा। तुमही द्रोन गंगेऊ । तुम्ह लेख , बेहरि = विदीर्ण होकर । जेहि वैदि = जिस बंदीगृह में । मुक्त करावों = कराऊँउड़ा! (४) तुरकान = मुसलमान लोग । उसे ग्रगस्त = अगस्त्य के , थाने पर । उदय होने परशरत् हस्ति जब गाजा = हाथी चढ़ाई पर गरजेंगेया हस्त नक्षत्र गरजे। आाइहि = जायेगा । दीटिहि = दिखाई पड़ेगा । परिहि पलानि..पीटिहि = घोड़े की पीठ पर जीन पड़ेगी, लिये चढ़ाई के घोड़े कसे जयगे। अंक = ग्रंकूर । = शशधर) लीन्ह पान = वीडा लिया, प्रतिज्ञा की । केहि.जोरा =यहाँ से पद्मावती के वचन ' सहर, चंद्रमा । (५ हैं । सावंत = सामंत । । टारन भारन्ह = भार हटानेवाले । भवारा = भपाल करन। मालकदेऊ(?) । लेंदिछोर बंधन छुड़ानेवाले । = करें =मालदेव । लखाघर । खंभ = राज्य का स्तंभरत्नसेन । (६) दैत संभारा । = लाक्षागह दैत्यों का संहार करनेवाले । ,