पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४२५

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पद्मावती गोरा बादल संवाद खंड २४ (महि युधिष्ठिर ऑौर दुरजोधन। तुमतेिं नोल नल दोउ संबोधन ।। परसुराम राघव तुम जोधा। तुम्ह परतिज्ञा में हिय बोधा ॥ तुमतिं सत्रुघन भरत कुमारा । तुमति तस्न चानूर सैंयारा ॥ तुम परदुम्न श्री अनिरुव दोऊ । तुम अभिमन्य बोल सब कोऊ ।। जुम्ह सरि पूज न विक्रम साके । तुम हमीर रिचंद सत श्राँके ॥ जस ग्रति संकट पंडवन्ह, भएड भीधे बंद छोर । तस परबस पिउ काढ़हराखि लेह भ्रम मोर ॥ ६ । गोरा बादल बीरा लोन्हा । जस हनुवंत अंगद बर कीन्हा ॥ सजह सिंघासनतानहु छात्। तुम्ह माथे जुग जुग अहिवाल । केवल चरन भुझे धरि दुख पावहु। चरि सिंघासन मंदिर सिधाबहु ।। सुनतह सूर केवल हिंय जागा। केसरि बरन फूल हिय लागा॥ ज, निसि महें दिन दोन्ह देखाई। भा उदोत, मसि गई बिलाई ॥ चढ़ो सिंघासन झमकति चलो। जानहें चाँद दुइज निरमली ॥ औौ ढंग सखी कुमोद तराई। ढारत चंवर नंदिर लेइ नाई। देखि दुइज सिंघासन, संकर धरा लिलाट । वल चरन पदमावति, लेइ बैठारी पाट 1७ । गंगेऊ = गांगेय, भीष्म पितामह । तुम्ह = तुमको समझती हूं। संबोधन = लखों ढाढ़स देनेवाले । तुम्ह परतिज्ञा = म्हारी प्रतिज्ञा से । बोधा = प्रबोध, तसल्ली । सत नके = सत्य की रेखा खींची है। स्रम = प्रतिष्ठा, सम्मान । (७) बर = बल । अहिवानु = सौभाग्य, सोहाग । उदोत = प्रकाश । देखि दुइज'लिलाट : = दूज के चंद्रमा को देख उसे बैठने के लिये शिव जी ने अपना लिलाटरूपी ईसहासन रखा अर्थात् अपने मस्तक पर रखा।