पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४२७

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गोरा बादल युद्धयाना खंड २४५. मनि कुंडल डोलै दुई नवना। सीस धुनहि सुनि सुनि पिछ गवना॥ नागिनि अलक, झलक उर हारू। भएच सिंगार कंत बिनु भारू ।। गवन जो आावा पंवरि महेंपिउ गबने परदेश । सखी बझावहि किमि अनल, बुहै सो केहि उपदेस ? ॥ ३ ॥ मान गवन सो घट काढ़ी । बिनने थाइ बार भइ ठाढ़ी । तीखे हरि चीर सैहि ओोढ़ा। कत न हेर, कोन्ह जिऊ पोढ़ा ॥ तब धनि बिसि कोन्ह सहूँ दीटी । बादल मोहि दीन्हि फिरि पीटी ॥ मु ख फिराइ मन अपने रीसा। चलत न तिरिया कर मुख दीसा ॥ भा मिन मेष नारि के लेखे । कस पिउ पीठि दीन्हि मोहि देखे ।। मकू पिछ दिस्टि समानेड़ सा।ि हलसी पीटि कढ़ावों फालू कुच कुंवी अब पीडि गड़वाँ। है जो कि, गाढ़ रस धोव ॥ रहों लजाह त पिउ चलेगहों त कह मोहिंह ढीठ । ठाहि तेवानि कि का कर्जदूभर दुनौ बईठ ॥ ४ ॥ लाज किए जो पिछ नहि पावधे। तजशें लाज कर जोरि मनावों॥ करि हठ कंत जाइ जेहि लाजा। घुघुट लाज मावा केहि काजा । तब धनि विहँसि कहा गहि फेंटा। नारि जो विनवे कत न मटा। श्राज गवन हीं ग्राई, नाहाँ। तुम न, कंत ! गवनह रन माहर्ता । गवन श्राव धनि मिल के ताईं। कौन गवन जौ बिछुरे साई ॥ धनि न नैन भरि देखा पीऊ। पिछ न मिला धनि सर्ण भूरि जीऊ। जहें अस आस भरा है केवा। भंवर न तजे बवास रसलेवा । पार्टीन्ह धरा लिलाट धनि, बिनय सुनह, हो राय अलक परी फंदवार होई, कैसेहु त न पाय । छड़पट धनि बादल कहा फेट न गहा ! । प्ररुष गवन धनि । जो तुड , स्वामी गवन ग्राइगजगामी। गवन मोर जहँवाँ मोर । जौ लगि राजा छटेि न आावा। भाव बीर, सिंगार न भावा ॥ तिरिया भमि खड़ग के चेरी। जीत जो खड़ग होइ तेहि केरी ॥ (४) बार = द्वार। हेर = ताकता । पोढ़ा = कड़ा । मिन = नागा पीछा है मेष , सोच विचार मसालू = शायद मेरी तीखी दष्टि का साल उसके हृदय में पैठ है । हुलसी फल गया = वह सभल पीट की और हुलस कर जा निकला है इससे मैं बह गड़ा हआ तीर का फल निकलवा त। कुच यूबी वैसे ही गड़ोबों = जैसे धंसे हए काँटे आदि को लंबी लगाकर निकालते हैं अपनी कूचरूपी तंबी जरा पोट में लाग। गहै जो धोवीं पीड़ा से चौंककर जब वह मुझे पकड़े तब मैं गाढ़े रस से उसे धो डालू अर्थात् रसमग्न कर मैं । तेवानि = चिता में पडो हुई । दु = दान बाते (५) मिले के ताई = मिलने के लिये । फंदवार = फंदा। (६) पुरुष गवन = पुरुष के चलते समय। बीर = वीर रस ।