पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४३

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( २३ ) संयोग होने पर पद्मावती के रसरंग का वर्णन किया वैसे ही सिंहलद्वीप से विदा

ोते समय परिजनों औौर सखियों से ग्रलग होने का स्वाभाविक दु:ख भी। कवि ने

जगह जगह पद्मावती को जैसे चंद्रकमल इत्यादि के रूप में देखा है, वैसे ही उसे प्रथम समागम से डरते, सपत्नी से झगड़ते औौर प्रिय के हित के अन्क्ल लोक व्यवहार करते भी देखा है। राघव चेतन के निकाले जाने पर राजा और राज्य के अनिष्ट की ग्राशंका से पद्मावती उस ब्राह्मण को अपना खास कंगन दान देकर संतुष्ट करना चाहती हैं । प्रेम का लकपक्ष कसा सुंदर बीच भी अपनी भाभा का प्रसार करनेवालो प्रेमज्योति का महत्व कुछ कम नहीं । जायसी ऐकांतिक प्रेम की गूढ़ता गौर गंभीरता के बीच बीच में जीवन के औौर ऑौर अंगों के साथ भी उस प्रेम के संपर्क का स्वरूप कुछ दिखाते गए हैं, इससे उनकी प्रेमगाथा पारिवारिक और सामाजिक जीवन से विच्छिन्न होने से बच गई है । उसमें भावात्मक और व्यवहारात्मक दोनों शैलियों का मेल है । पर है वह प्रेमगाथा ही, पूर्ण जीवनगाथा नहीं । ग्रंथ का पूर्वार्ध-प्राधे से अधिक भाग-—तो प्रेममार्ग के विवरण से हो भरा। है । उत्तरार्ध में जोवन के औौर ऑौर अंगों का संनिवेश मिलता है। पर वे पूर्णतया परिस्फुट नहीं हैं ।दांपत्य प्रेम के प्रतिरिक्त मनुष्य की प्रौर वृत्तियाँ जिनका कुछ विस्तार के साथ समावेश है, वे यात्रा, युद्धसपत्नीकलह, मातस्नेह, स्वामिभक्ति, वीरता, कृतघ्नता, छल ऑौर सतीत्व हैं । पर इनके होते हुए भी पद- मावत' को हम गाररस प्रधान काव्य हो कह सकते हैं। । ‘रामचरित' के समान मनुष्य जीवन की भिन्न भिन्न बहुत सी परिस्थितियों और संबंधों का इसमें समन्वय ९ ९ तोते के मु ह से पद्मावती का रूपवर्णन सुनने से राजा रत्नसेन को जो पूर्वराग हुजा, अब उसपर थोड़ा विचार कीजिए। देखने में तो वह उसी प्रकार का जान पड़ता है जिस प्रकार का हंस के मुख से दमयंती का रूपवर्णन सुनकर नल को या नल का रूपवर्णन सुनकर दमयंती को हुआ था। पर ध्यान देकर विचार करने से दोनों में एक ऐसा अंतर दिखाई पड़ेगा जिसके कारण एक की तीव्रता जितनी अयुक्त दिखाई देगी उतनी दूसरे को नहीं । पूर्वराग में ही विप्रभ श्रृंगार की बहुत सी दशाशों की योजना श्रीहर्ष ने भी की है और जायसी ने भी । पूर्वराग पूर्ण रति नहीं है, अतः उसमें केवल ‘अभिलाष' स्वाभाविक जान पड़ता है, शरीर का सूखकर काँटा होना, मू, उन्माद नादि नहीं । तोते के मुंह से पहले ही पहल पद्मावती का वर्णन सुनते ही रत्नसेन का मूछित हो जाना औौर पूर्ण वियोगी बन जाना अस्वा भाविक सा लगता है । पर हंस के नैह से रूप गुण आादि की प्रशंसा सुनने पर जो विरह की दारुण दशा दिखाई गई है वह इस िये अधिक नहीं खटकती कि नल ऑौर दमयंती दोनों बहुत दिनों से एक दूसरे के रूप गुण को प्रशंसा सुनते आ रहे थे जिससे उनका पूर्वराग 'मंजिष्ठा राग' की अवस्था को पहुँच गया था । जब तक पूर्वराग आगे चलकर पूर्ण रति या प्रेम के रूप में परिणत नहीं होता तब तक उसे हम चित्त की कोई उदात्त या गंभीर वत्ति नहीं कह सकते । हमारी सम में तो दूसरे के द्वारा, चाहे वह चिड़िया हो या अंादमी, किसी पुरुष या स्त्री के रूप, गुण आदि को सुनकर चट उसकी प्राप्ति की इच्छा उत्पन्न करनेवाला भाव