पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४३८

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२५६
पदमावत

२५६ काग चोचतत साले, नाहा। जब बँदि तोरि साल हिय माहां ॥ कहीं काग ! अब तईं लेइ जाही। जहँवा पिछ देख मोहि खाही' ॥ काग औ गिद्ध न खंडहि, का मारहबह मंदि ? । एहि पछतावै सुवि मृइऊँगइर्दी न पिछ सँग बंदि ॥ ६ ॥ तेहि ऊपर का कहीं जो भारी। विषम पहार परा दुख भारी ॥ दूती एक देवपाल पठाई । बाढनि भेस रै मोहि श्राई ॥ कहै तोरि हौं ग्राएँ सहेली । चलि लेइ जाऊँ भंवर जाँ, बेली ॥ तब में ज्ञान कीन्ह; सत बाँधा । मोहि कर बोल लाग विप साँधा !। कहें ऊंवल नहि करत अहेरा। चहै भंवर बरै से फेरा पाँच भूत आातमा नेवारिंदें । बारह बार फिरत मन मारिऊँ । रोइ बुझाइशें नापन हियरा । कंत न दुर, अहे सुटि नियरा ॥ फूल बास, घिउ छीर , नियर मिले एक ठाई । तस कंता घट धर है, जितें अगिनि कहें खाईं ॥ ७ ॥ के के का मारह , बह मंदि = वे मुझे क्या मारते, मैं बहत क्षीण हो रही थी। (७) मारी = मार, चोट । साँधा = सना, मिला। कहें वर्ल" फेरा = से चाहे भरा (सौ जगह फेरे लगाए पुरुष) पर कमल (स्त्री) दूसरों को फंसाने नहीं जाता। भूत मारि* = फिर योगिनी बनकर उस योगिनी के। पाँच साथ इच्छा हुई पर अपने शरीर श्रमौर मात्मा को घर बैठे ही वश जाने की किया औौर योगिनी होकर द्वार द्वार फिरने की इच्छा को रोका । जेड = ज्यों, जिस प्रकार 1 = जैसे फल में दूध में घी फल वास“खाइ महक और मिला रहता है वैसे ही अपने शरीर में तुम्हें मिला समझकर इतना संताप सहकर जीती रही । के में