पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४५

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( २५ ) प्रेम दूसरा रूप चाहता नहीं, चाहे वह प्रेमपात्र के रूप से कितना ही बढ़कर हो । लैला कुछ बहुत खूबसूरत न थी, पर मजनू ” उसी पर मरता था । यही विशिष्टता । और एकनिष्टता प्रेम है । पर इस विशिष्टता के लिए निदिष्ट भावना चाहिए जो एक तोते के वर्णन मात्र से नहीं प्राप्त हो सकतो। भावना को निर्दिष्ट करने के लिये ही मनस्तत्व से अभिज्ञ कवि पूर्वराग के बोच चित्रदर्शन को योजना करते हैं । पर यह रूपभावना पूर्व रूप से निर्दिष्ट साक्षात्कार द्वारा ही होती है । शिवमंदिर में पद्मावती की एक झलक जब राजा ने देखो तभी उसकी भावना निर्दिष्ट हुई । मंदिर में उस साक्षात्कार के पूर्व राजा की भावना निदष्ट नहीं कही जा सकतो। मान लीजिए कि सिंहल के तट पर उतरते हो वही अप्सरा कहती कि 'मैं ही पद्मावती हूँ, औौर होता भी सकारता, तो रत्नसेन उसे स्वीकार ही कर लेता। ऐसी अवस्था में उसके प्रेम का लक्ष्य निर्दिष्ट कैसे कहा जा सकता ? अतः रूपवर्णन सुनते ही रत्नसेन के प्रेम का जो प्रबल और अदम्य स्वरूप दिखाया गया है वह प्राकृतिक व्यवहार की दृष्टि से उपयुक्त नहीं दिखाई पड़ता। राजा रत्नसेन तोते के मुंह से पद्मावती का रूपवर्णन न उसके लिये जोगी होकर निकल पड़ा औौर अलाउद्दीन ने राघव चेतन के मुंह से वैसा ही वर्णन सुन उसके लिये चित्तौर पर चढ़ाई कर दी। । क्यों एक प्रेमी के रूप में दिखाई पड़ता है औौर दूसरा रूपलोभी लंपट के रूप में ? अलाउद्दीन के विपक्ष में दो बातें ठहरती हैं--(१) पद्मावती का दूसरे की विवाहिता स्त्री होना औौर (२) अलाउद्दीन का उग्र प्रयत्न करना । दोनों प्रकार के अनौचित्य अलाउद्दीन की चाह को प्रेम का स्वरूप प्राप्त नहीं होने देते । यदि इस अनौचित्य का विचार छोड़ दें तो रूपवर्णन सुनते ही तत्काल दोनों के हृदय में जो चाह उत्पन्न हुई वह एक दूसरे से भिन्न नहीं जान पडती । रत्नसेन के पूर्व राग के वर्णन में जो यह अस्वाभाविकता आाई है इसका कारण है लौकिक प्रेम ऑौर ईश्वरप्र म दोनों को एक स्थान पर व्यंजित करने का प्रयत्न । शिष्य जिस प्रकार गुरु से परोक्ष ईश्वर के स्वरूप का कुछ आभास पाकर प्रेममग्न होता है। उसी प्रकारत्नसेन तोते के मुंह से पद्मिनी का रूपवर्णन सुन बेसुध हो जाता है । ऐसी हो न लौकिकता पद्मिनी के पक्ष में कवि ने दिखाई है । राजा रत्नसेन के सिंहल पहुँचते ही कवि ने पद्माव'तो की बेचैनी का वर्णन किया है। पद्मावती को अभी तक रत्नसेन के जाने को कुछ भी खबर नहीं है । यह व्याकुलता केवल काम की कही जा सकती है, वियोग को नहीं । बाह्य या अत चाभ्यंतर संयोग के पीछे ही वियोगदशा संभव है । यद्यपि प्राचार्यों ने वियोगदशा को कामदशा ही कहा है पर दोनों में अंतर है । समागम के सामान्य अभाव का दु:ख कामवेदना है और विशेष के समागम के अभाव का दु:ख वियोग है । जायसी के वर्णन में दोनों का मिश्रण है। रत्नसेन का नाम तक सुनने के पहले वियोग की व्या कुलता कैसे हुई, इसका समाधान कवि के पास यदि कुछ है तो रत्नसेन के योग का अलक्ष्य भाव । पदमावति तेहि जोग सँजोगा। परी प्रेम बस गहे वियोगा ॥ साधनात्मक रहस्यवाद योग जिस प्रकार अज्ञात ईश्वर के प्रति होता है उसी