पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४५०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
२६८
अखरावट

अखरावट माथ सरग, धर धरती भएऊ। मिलि तिन्ह जग दूसर हो गए। माटी माँ, रकत भा नीरू। नसें नदीहिय समुद गंभीरू ॥ रोढ़ सुमेह कीन्ह तेहि केरा । हाड़ पहार जुड़े चलें फेरा बार विरिशरोवाँ खर जामा। सूत सूत निसरे तन चामा ॥ दोहा सातौ दीप, नव पैंटैंड, ग्राट दिसा जो ग्राहि । जो बरम्ड सो पिंड है, हेरत अंत न जाहि ॥ सारठा ७ ७ यागि, बाउजलथूरि, चारि मेरइ भांडा गढ़ा । ग्रा४ रहा भरि मूरि, मुहमद नापुहि ग्राषु महें 1 ८ ॥ गा गौरहु ग्रब मुनहु गियानी। कहीं ग्यान संसार बखानी ॥ नासिक पुल सात पथ चला। तेहि कर भौंहें हैं दुड़ पला ॥ चाँद सूरज दूनी सुर चलहीं। सेत लिलार नखत झलमलहीं । गत दिन निसि सांवत माँझा । हरप भोर विसम्य होइ साँई ॥ सुख चैठ भुगुति श्री भोगू । दुख है नरक, जो उप रोगू ॥ बरखा रुदन, गरज प्रति कोईं। जुिरी “स ठिबंचल छोटू ॥ घरों पहर बेहर हर । नौ ऋतुबारह मास ॥ साँसा बोते ख्य दोहा जुग जुग बीते पलहि पलअवधि घटति निति जाइ। मीड नियर जब श्राव, जानलु परलय श्राइ ॥ सर। हि घर ठग हैं पाँच, नवौ बार चहुदिति फिरह । सो घर केहि मिस बाँचमुहमद जौ निसि जागिए । " ॥ मिलि तिन्ह ‘‘गए = इन दो पक्षों से मिलकर मानो दूसरा ब्रह्मांड हो गया (यहाँ से कवि ने पिंड औौर ब्रह्मांड की एकता का प्रतिपादन किया है ) । रीढ़ = पीठ की हड़ो, मेरुदंड । ने । = . खर त! जाहि जिसका। मेरई मिलाकर । (९) नासिक पुल की वैतरणी का पुल जोगें पापियों के लिये तो बान बराबर पतला हो -चला = नाक मानो पुले सरात' (मसलमानों हो जायगा और दोनदारों के लिये खासी चौड़ी सड़क) का रास्ता चला गया है । भौंहें हैं दुइ पला = भौहैं मानो उस पुल के दो पार्च हैं दाहिने पाश्र्व से शुण्यात्मा से हैं । र बाएँ पापी जाते सुर = श्वास का प्रवाह जो कभी बाएँ नथुने से चलता है, कभी दहिने (इसी को बायाँ सुर या दहिना सुर कहते हैं)। जागत दिन = शरीर की जाग्रत अवस्था को दिन समझो। हम भार शरीर में जब हर्ष का संचार होता। है तब समझो (इस , प्रभात प्रकार चंद्र सूर्य, रातदिन, ऋतुमासवर्षा, चमक, गरजघड़ी, पहर, युग इत्यादि सब शरीर के भीतर समझो)। बेहर = अलग अलग होते हैं । हर = प्रत्येक । पाँच ठग = काम, क्रोध इत्यादि ।