पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४५२

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२७०
अखरावट

२७० दोहा तन तुरंग पर मनुशा, मन मस्तक पर प्रासु । सोई आासु बोलावई, अनहद बाजा पास ॥ देखह कौतुक नाइ, रूख सभाना बीज महूँ । आपुहि खोदि जमाइ, मुहमद सो फल चाखबई ॥११। चा चरित्र जी चाहल देखा। चूह बिधना के आलेखा ॥ पवन चाहूि मन बहुत उताइल । तेहि में परम आासु सुठि पाइल ॥ मन एक खंड न पहुचे पावे । आासु भवन न्नौदह फिरि श्रावै । भा जेहि ज्ञान हिये सो बू । जो धर ध्यान न मन तेहि रूकें ॥ पुतरी महें जो बिदि एक कारी। देर्श जगत सो पट बिस्तारी ॥ हरत दिस्टि उघरि तस ग्राई । निरखि सुन्न महें सुन्न समाई ॥ पेम समुंद सो अति अवगाहा। बड़े जगत न पावे थाहा ॥ दाहा। जबहि नींद चख श्रावे, उपजि उठे संसार । जागत ऐस न जाने, दह सो कौन भंडार ॥ सुन्न समुद चख माँहि, जल जैसी लहरें उठहै । उठि उठे मिटि मिटि जाहि, महमद खोज न पाइए I१२। छा छाया जस चंद लोए। ओोठई स मानि रहा करि गोस ॥ मनुमा = मन । अनहद बाजा = शब्दू, योग में अनाहत नाद । देखहु कौतुक चाखई = सारा संसारचूक्ष बीज रूपी ब्रह्म में ही व्यक्त भाव से निहित रहता और वही फल भी है बीज प्राप अपने को जमाता है और का भोक्ता आप ही होता है । (१२) अलेखा = विचित्र चाहि = अपेक्षा, व्यवस्था । बनिस्बत । उताइल = जल्दी चलनेवाला। । ग्रास = जीव, चेतन तत्व । पाइल' = तेज चलनेवाला (तेज चलनेवाले हाथी को 'पायल' कहते हैं) । तेरह तें परम—पाइल = उससे भी अधिक शीव्रगामी चित् तत्व है । मन तेहि । ने जिसका मन । रू* = उलाता है। विदि = माँख की पुतली के बीच का तिल । हेरत दिस्टिसमाई : = बात को देखकर ज्ञान होता कि इस कुछ है किस प्रकार एक बिंदी शन्य भीतर मान्य से उत्पन्न जगत् समाता है हयोग म। अनिमेष रूप से देर तक किसी बिंदु पर दष्टि जमाने की एक क्रिया भी है। जिसे नोटक कर्म कहते हैं) । चख = नेत्र । उपजि उठे संसार = स्वप्न की दशा में भीतर ही एक संसार खड़ा है जिससे इस बात मनुष्य के हो जाता (का संकेत मिलत। है कि श्रात्मतत्व के भीतर भी ब्रह्मांड है) । जगत भंडार = जागने पर मनुष्य यह नहीं जानता कि यह कौन सा ऐसा भांडार एस है जहाँ से इतनी वस्तुएँ निकलती चली जाती हैं । खोज = पता, निशान । (१३) छाया “प्रलोप्पू = इस संसार में जाकर चित् तत्व का यह बिंदु अदृश्य रहता है।