पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४६

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( २५ ) प्रकार सूफियों का प्रेमयोग भी अज्ञात के प्रति होता है, पर इस प्रकार के परोक्षवाद या योग के चमत्कार पर ध्यान जाने पर भी वर्णन के अनौचित्य की घोर बिना गए नहीं रह सकता। जब कोई व्यक्ति निर्दिष्ट ही नहीं तब कहाँ का प्रेम और कहाँ का वियोग ? उस कामदशा में पद्मावती को mाय समझा ही रही है कि हीरामन सूा आाकर रत्नसेन के रूप गण का वर्णन करता है और पद्मावती उसकी प्रेमव्यथा और त को सुनकर दयार्नी और पूर्वरागयुक्त होती है। पूर्व राग का प्रारंभ पद्मावती में यहीं से समझना चाहिए। अतः इसके पहिले योग की दुहाई देकर भी वियोग का नाम लेना ठीक नहीं जंचता । । बिवाह हो जाने के पीछे पद्मावती का प्रेम दो अवसरों पर अपना बल दिखाता हैं । एक तो उस समय जब राजा रत्नसेन के दिल्ली में बंदी होने का समाचार मिलता है और फिर उस समय जब राजा यद्ध में मारा जाता है । ये दोनों अवसर विपत्ति के हैं । साधारण दृष्टि से एक में ग्राशा के लिये स्थान है, दूसरे में नहीं । पर सच्चे पहुंचे हुए प्रेमी के समान प्रथम स्थिति में तो पद्मावती संसार की चोर दृष्टि रखतो हुई विट्ठल ऑौर क्षुब्ध दिखाई पड़ती है, और दूसरी स्थिति में दूसरे लोक की ओोर दृष्टि फेरे हए पूर्ण ग्रानंदमयी और प्रशांत । राजा के बंदी होने का समाचार पाने पर रानी के विरहविह्वल हृदय में उद्योग और साहस का उदय होता है के उद्धार वह गोरा औौर बादल के पास जाती है औौर । आप दौड़ी रो रोकर अपने पांत क उद्धार की प्रार्थना करती है । राजा रत्नसेन के मरने पर रोना धोना नहीं सुनाई देता । नुरागमती औौर पद्मावती दोनों श्रृंगार करके प्रिय से उस लोक में मिलने के लिये तैयार होती हैं । यह दृश्य हिंदू स्त्री के जीवनदीपक की अत्यंत उज्ज्वल औौर दिव्य प्रभा है जो निर्वाण के पूर्व दिखाई पड़ती है । राजा के बंदी होने पर जिस प्रकार कवि ने पद्मावती के प्रेमप्रसूत साहस क। दृश्य दिखाया है उसी प्रकार सतीत्व की दढ़ता का भी। पर यह कहनी पड़ता है कि व ने जो कसौटी तैयार की है वह इतने बड़े प्रेम के उपयुक्त नहीं हई है । भल नेर देवपाल पराक्रम, भी रैनसेन का राजा , रूप गुणऐश्वर्यप्रतिष्ठा किसी में की बराबरी । उसका दूती का न थाअतभेजकर पद्मावती को बहकाने का प्रयत्न गड़ा हुआ खंभा ढकलन का है। बालप्रयत्न सा लगता है। इस घटना के संनिवेश से पद्मावती के । सतीत्व की उज्ज्वल कांति में और अधि औोप चढ़ती नहीं दिखाई दता । यदि वह दूती दिल्ली के बादशाह की होती और वह दिल्लीवर की सारी शक्ति और विभूति का लोभ दिखाती तो अलबत यह घटना किसी हद तक इतने बड़े प्रेम की परीक्षा प्राप्त कमलादेवी का पद कर सकती थी, क्योंकि देवलदेवी विपयाचरण का दृष्टांत इतिहासविज्ञ जानते ही हैं। पद्मावती के नवप्रस्फुटित प्रेम के साथ साथ नागमती का गास्थ्यपरिपुष्ट प्रेम भी अत्यंत मनोहर है। प्रेमिका रूप अधिक लक्षित है पद्मावती के में होती , पर नागमती पतिप्राण हिंदू पत्नी के मधर रूप में ही हमारे सामने जाती है । उसे पहले पहल हम नौर में देखते हैं । ये दोनों प्रकार के रूपगोवता प्रमगोवता क रूप गर्व दांपत्य सुख के द्योतक हैं । राजा के निकल जाने के पीछे फिर हम उसे प्रोषित- पतिका के उस निर्मल स्वरूप में देखते हैं जिसका भारतीय काव्य और संगीत में