पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४७०

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२८८
अखरावट

२८८ मन भु देड़ सब अँग मो। तन सो बिनै दाउ कर जोरे ? । सूत सूत सो कया मैंजाई। सीझा काम विनत सिधि पाई । राउर धागे का कहें, जो सँवरै मन लाइ । तेहि राजा निति संव, पूछे धरम बलाई । तेहि मुख लावा लूक, ससुझावै समु नहीं । पर खरा तेहि चूक, मृहमद जेहि जाना नहीं । ४३ ॥ मन सौं देई कढ़ती दुइ गाढ़ी । गाढ़े छीर रहे होइ साढ़ी । ना श्रोहि लेखे गति न दिभा । करगह नैठि साट सो बिना। खरिका लाड करे तन घी'। नियरन हो, डरे इलीसू ।। भर सास जव नावें। री। निसर्ग ठंी, ॥ पैसे भरी। लाइ लाइ नरी चढ़ाई। इललिलाह के ढारि चलाई ॥ के चित डोले नहिं बूटी दुरई। पल पल पेखि ग्राग अनुसरई ॥ सीधे मारन पहंचे जाई। जो एहि भाँति करै सिधि पई ॥ दाहा चले साँस तेहि मारग, जेहि से तारन हो । ध पार्टी तेहि सोढ़ो, तुरतें पहंचे सो ।। सोरा दरपन बालक हाथ, मुख देख दूसर गने । तस भा दुइ एक साथ, मुहद एजें जानिए ।॥ ४४ ॥ कहा मुहम्मद प्रेम कहानी। सुनि सो ज्ञानी भए चियानी । मुर्रा = ऐंठन । वि’ = (क) बुने, (ख) विनय करके । पाई = पतली छडियों का ढाँचा जिसपर ताने का सूत फैलाते हैं । राउर = प्रापके। आगे - - सामने । धरम = धर्म से १. पातर--‘सीया'। २. पाटiतर--‘घड़ी' । (४४) कढ़नी = मथानी में लगाने की डोरी, नेती। गाढ़े छीर... साढ़ी = नहीं तो गाढ़ा दूध मलाई हो जाता है । साट =यस्त्र, धोती । खरिका = कमानी ? घीसू = माँजा, रगड़। इधलीस = शैतान । ३. पाठ ‘ची' है, जिसका कुछ अर्थ नहीं जान पड़ता। नरी = ढरकी के भीतर की नली जिसपर तार लपेटा रहता है । इललिलाह: = ईश्वर का नाम। डारि = हरकी । टूटी = जिसमें ताना लपेटा रहता है । ग्राग अनुसरई = आगे बढ़ता है। चलें साँस तेहि मारग = इला चौर पिंगला दोनों से दहिने और बाएँ श्वास का चलना हठयोगवाले मानते हैं । तारन उद्धार । (४५) ज्ञानी =' तत्वज्ञ ।