पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४८०

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२९८
आखिरी कलाम

२९८ याखिरी कलाम से बरस छतीस जो भए। तब एहि कथा क ग्राखर कहे देख जगत धुंध कति माहाँ। उवत धूप धरि नाबत छाहाँ ।। यह संसार पवन कर लेग्ना । माँगत बदन नैन भरि देखा । लाभदिए बिनु भोग, न पानव । परिहि डाँढ़ जाँ पर वाउब ॥ राति क सपन जागि पछिताना । ना जान कब होइ बिहाना ॥ अस मन जानि बेसाहह सोई । मूर न घटेलाभ जेहि होई ॥ ना जानेई बाढ़त दिम जाई। तिल तिल है नाउ नियराई । स जिन जानेह बढ़त है, दिन प्रावत निवरात कहै सो वृ ि‘मुहम्मद, फिर न कहीं असि बात ।' जबहि ग्रंत तार परलै ना? ई। धरमी लोग रहै ना पाई ॥ जबही सिद्ध साधु गए पारा। तबहीं चले चोर बटपारा ॥ जाइहि मया मोह सब केरा। मच्छ रूप के झाझहि वेरा ! उटिहै वेद पुराना। दत्त सन दो कब्रिहि पथाना ॥ पंडित धू म बरन सूरु होइ जाई। कृन्न वरन सब सिटि दिखाई ॥ द! पुत्र दिसि उ जहाँ। पुनि फिरि ।इ अइहै तहाँ ॥ चढ़ि गदहा निकसे श्ररि जालु । हाथ खंड हो, मावे का । जो रे मिले तेहि मरेफिर फिरि आइ के गाज । सवही मार ‘हम्मत अड़िता राज १४ पुनि धनी याणयु दरवलेइ सब कोई ॥ कहूँ होई। उगिरे , भोर मोर' करि उठहैं भारो। महूँ कहैिं ॥ आयु प्रापू गारी ग्रम न कोड जाने मन मोहाँ । जो यह सँचा है तो कहाँ । श्र ति : रहस कूद अपने जिउ करहीं । मंति लेड लेइ घर भरहीं खनहि उतंग, खनहि फिर साँतो । निलहि ह लंब उठे बह भाँती ॥ पुनि एक ग्र तरज चढ़े भाई । नाचें ‘जारी' मैंने त्रिलाई ॥ ग्राहि । जो तेहि सोई के कॅ‘धे जि न कोईन मरे भक्खे ॥ सव संसार फिराइ ऑौ. लार्श्व गाहिरी । घात उनहूँ कहें लागिहि जात 1१५। । ‘हम्मद, बार न (१३) माँगत देखा = सबको मुँह से माँगते ही देखा । (१४) प्राई = ग्राहि आाएगा। रूहबड़ी मछलियाँ , मच्छ बेरा = जैसे छोटी मछलियों को पकड़कर खा जाती , वैसा ह व्यवहार मनुष्यों के है, बोच और हो जायगा। दत्त सत = दान सत्य। जला हुा। = 1 - = भोगेगा। रहिता = निर्जन, निकटक । ( दधा = बड खा। ज १५) झारी = सब के , = संचित कियाजुटाया। = समेटकरसहेजकर । वविल अल । सचसंति उतंग - उभार, जोर शोर । सांतो = शांति । ह लंब = हुल्लड़, हल्ला, हलचल । वे = फिरतो है । विलाई = बिल्लो । फिरा = फिरते हैं । उनहें हैं उनको भां । =