पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४९४

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३१२
आखिरी कलाम

३१२ आाखिरी कलाम सोवन नाजु जो चाहै, साजन मरदन होइ । देह सोहाग ‘मुहम्मद, सुख बिरसे सब बौड़ 11५६। । पैटि बिहिस्त जौ नौनिधि पैहैं। अपने अपने सँदिर सिहैं । एक एक मंदिर सात दुबारा । अगर नंदन के लाग केवारा ॥ हरे हरे बह खंड सँवारे। बहुत भाँति दइ ग्राह्य सँवारे ॥ सोने रू घालि उचावा। निरमल कुर्ती लाग गिलावा i। में कुएँ हीरा रतन पदारथ जरे । तेहि क जोति दीपक जस बर्ग । नदी दूध अतरन के बहहीं । मानिक मोति परे भुड़ रहहीं ॥ ऊपर गा अब सोहाई । एक एक खंड छाह चहा दुनियाई तात न जूड़ न कुनकुनदिवस राय त नह दुख नींद न भूख मुहम्मद, सब बिरसे अति सुक्ख ।५६ देखत मरन केरि निकाई । मोहि रहत मुरछाई ॥ रूप में । लाल करत मख पासा। कीन्ह चहैं किट ोग बिलासा ॥ जहब हैं मागे बिनवे सब रानी। औौर कहैं सब चेरिन्ह आानी ॥ ए सब प्रार्थी मोरे निवासा। तुम आाभ लेड़ झाउ कबिलासा ।। जो अस रूप पाट परानी। औौ सबहिन्ह चेरिन्ह के रानी ॥ बदन जोति मनि माथे भाग । श्र विवि नागर दीन्ह सोहागू ।। साहस करें सिंगार सँवारी। रूप सुरूप पदमिनी। मारा ॥ पाट बैटि नित जोहैं, बिरहन्ह जारौ माँस ॥ दीन दयाल ‘मुहम्मद' !, मानह भोग विलास 1५८। ॥ सुनहि सुरूप अबहि बह भाँती। इनहि चाहि जो है रूपवती। ॥ सातवें पवैरि नवत तिन्ह पेखब। सात ग्राए सो कौकृत देखब ॥ चले जाब भागे तेहि आासा। जाइ परब भीतर कबिलासा तखत बैटि सब देखब रानी। जे सब चाहि पाट परधानी ।। दसन जोति उ चमकारा। सकल बिहिस्त होइ उजियारा ॥ बाहबानी कर जो सोना। तेहि में चाहि रूप प्रति लोना ॥ नरमल बदन चंद के जोती सब क सरीर दिघे जस मोती। । बास सुबास व जेहि बेधि भंवर कहें जात । बर सो देखि ‘मुहम्मद' हिरद महें न समात ।। पग पैग जस जस नियराउब । अधिक सवद मिले कर पाउब। ॥ नन समाइ रहै चुप लागे । सब कहें आाइ लेहि होइ अगे। साजन = म्वजन, प्रियतम 1 मरदन = मालिगन । बिरसे = बिलसे (५७) दइ = दैव, विधाता। गिलावा = गारा । तात = गरम । कुनकुन प्राध गरम । (५८) लाल = प्यार, दुलार। नागर = बढ़कर। (५) रुपवाती रूपवती। कौकृत = कौतुक, चमत्कार । चाहि = बढ़कर 1. बास सुबास जात जिस भौंरे को बेचकर छूने के लिये सुगंध जाती है । = कुनकुना