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कारण मराठोंके हाथसे निकलने लगा। परन्तु औरंगज़वके अत्याचारोंके कारण नवयुवकों का रक्त खौलने लगा था और उनमें देशप्रेम और धर्म-रक्षाके अंकुर जमने लगे थे। वे पर-धर्मानुयायियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे और उनमें पूर्ण-जागृति हो चुकी थी। मराठों का गौरव जीवित रखने के लिये आगे के २५ वर्ष तक निरस्तर कठिन परिश्रम करना पड़ा। अएणीगिरी――यह बंबईके इलाके में धारवाड़ जिले में है। धारवाड़-गदग मार्गपर नवलगुंदके दक्षिण पूर्व में लगभग १०मीलपर है। उत्तर अक्षांश १५°२२' तथा पूर्व देशान्तर ७५°२६' पर स्थित सात हज़ार जनसंख्याका यह एक गाँव है। यहां अमृतेश्वरकाएक मंदिर है। कहते हैं कि इसे जखना चार्य ने बसाया था। मंदिर की दीवालोंपर पौराणिक चित्र खुदे हुए हैं। मंदिर में ११५७ से १२०८ ई॰ के बीचके कालके ६ शिला लेख मिले हैं। दूसरे मंदिरोंमै भी शिला-लेख मिलते हैं। ११६३ ई॰ मै कलचुरीके राजा विज्जलदेवने पश्चिमी चालुक्योंको पराजित करके अण्णीगिरीको अपनी राजधानी बनाया। विज्जलके पुत्र सोमेश्वर (१९६७–११७५ ई॰) के समयके शिला लेख मिले हैं। उनसे पता लगता है कि ११७५ ई॰ तक है। यह राजधानी थी। ११८४ ई॰ में पश्चिम चालुक्यों के राजा सोमेश्वर चतुर्थने कल्याणके जैन और लिंगायतोके झगड़ेसे लाभ उठाकर चालुक्य राज्य फिरसे स्थापित करने का प्रयत्न किया था। एक शिलालेखसे पता चलता है कि ११८९ ई॰ में देवगिरीके तीसरे राजा यादवभिल्लम (सन् ११८७-१९९१) मांडलिक महामंडलेश्वर बाचिराजकी राजधानी अण्णगिरी थी। एक शिला लेखसे पता चलता है कि बाचिराजाके बाद शीघ्रही वीर वल्लाल नामक होयंसल राजा (सन् ११९२ से १२११ ई॰ तक) की भी यही राजधानी थी। (फ्लीटका “कनाड़ी राजघरानेपर ग्रंथ”) १८०० ई॰ में जब प्रसिद्ध धौड्या बाघ डंबलसे भागा था उस समय वह अण्णगिरीमें ठहराथा। अण्णगिरी, धारवाड़ तथा हुबली में अक्तूवर २८०० ई॰ में वेलिज़लीने खेमे तयार करवाये। (सप्लीमेंटरी डिस्पैचेस-भाग २) ब्रिटिश शासनके आरंभ होने के समय अण्णगिरी निपाणी राज्यकी जागीरमें शामिल था। १८२७ ई॰ में यहाँ ४५० घर, १४ दुकाने तथा कुछ कूए थे।१८३९ ई॰ में कोई वारिसन रह जानेके कारण कानूनके अनुसार ब्रिटिश सरकार ने इस जांगीर को अपने राज्य |
मिला लिया। हुबली तथा धारवाड़ के समान यह गाँव पहले कपड़े की तिजारतके लिये प्रसिद्ध था। (धारवाड़ गजेटियर इम्पीरियल गजेटियर) अतर―(इत्र अथवा सुगन्धित पदर्थ) जिस भाँति मनुष्य भिन्न भिन्न इन्द्रियों द्वारा शब्द, स्पर्श रूप रस का अनुभव करके प्रसन्न होता है उसी भाँति घ्राणेन्द्रिय-प्रिय इत्र अथवा अन्य सुगनधित पदार्थ का भी उपयोग मनुष्यजातिके इतिहासमें बहुत प्राचीन है। पुष्प, काष्ट,पत्ती, कस्तूरीसे अतर अर्क तेल इत्यादि अनेक सुगन्धित पदार्थ तय्यार होते हैं। सुगन्धिसे मनुष्य का चित्त प्रसन्न तथा आल्हादित रहता है। प्राचीन कालके सभ्य राज्यों तथा देशों में इसका उपयोग बहुत होता था। मिश्र अरब,सीरिया, इरान, इटली, यूनान आदि देशोंमें इसकी प्रथा बहुत प्रचलित थी। इसी कारण यह कला बहुत पूर्व कालहीमें पूर्णत्वको प्राप्त हो चुकी है। भारतवर्ष भी इस कलामें अत्यन्त प्रवीण था। इसका मुख्य कारण यह भी है कि यहां पुष्प इत्यादि बहुत अधिक उत्पन्न होते हैं। अतर अथवा सुगन्धित पदार्थ केवल शौकीन अथवा विलासी पुरूष ही व्यवहारमें लाते हों यह बात नहीं है। यह धार्मिक कृत्यों तथा देवपूजन इत्यादिमें काममें लाया जाता देव-प्रतिमाओं अथवा समाधियों इत्यादि पर फूल चढ़ाने की, तथा सुगन्धित तेल मर्दन कर स्नान कराने की प्रथा बड़ी प्राचीन है। मिश्रदेशमें मृतकके शवमें इत्र पोतने की प्रथा थी। यूनान और रोममें तो इतना अधिक प्रचार बढ़ गया था कि इसके पीछे बहुत धन नष्ट होने लगा था। इसी कारण समय समय पर इसके विरूद्ध नियम बनाये जाते थे। इसी भाँति चन्दन, ऊद, अबीर इत्यादि सुगन्धियोंकी धूनी देकर गृह शुद्ध करने की प्रथा है। उपरोक्त पदार्थोंके अतिरिक्त रासायनिक पदार्थों के मेलसे भी अतर बनाया जाता हैं। उसे रासायनिक सुगन्ध कह सकते हैं। इत्र तथा अर्क बनाने की रीतियां भिन्न भिन्न हैं। सबका विस्तार देना तो इस छोटेसे लेखमें असम्भव है। जबसे जर्मनी इत्यादि विदेशोंसे अर्क (Essence सत) आने लगे हैं भारतवर्ष में इत्रका कारबार बहुत ठण्डा पड़ गया है। ये बहुत सस्ते पड़ते हैं और इनके मेलसे सुगन्धित तेल इत्यादि बड़ी सुगमतासेत य्यार हो जाते हैं। अब तो भारतसे इस सम्बन्ध का कच्चा माल भी बाहर भेजा जाता है जो इत्र और अर्कके रूपमें आकर लाखों रूपये का बिक जाता है। १९१४, १९१५ ई० में यहाँ |
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अण्णीगिरी
अतर
ज्ञानकोष (अ) १२८