|
स्पिरिट आफ वाइन २॥ औंस और स्त्रवित जल १ औस। इन सबको आठ दिन एक बोतलमें भर कर रख देने के बाद व्यवहार में लावे। धूपबत्ती बनानेकी कृति नं॰ १―नरवला ४॥ छटांक, गटाना २॥ छटांक, गुलाब कली १/४ छटांक, पत्थर फूल २। छटांक, ऊदका फूल १/४ छटांक, शिलारस १/४ छटांक, शहद १/४ छटांक, खस छटांक, ब्राह्मी २॥ छटांक, टोपचीनी २॥ छटांक, जटामासी ४॥, छुदांक, पानड़ी २॥ छटांक। उपरोक्त पदार्थों को वारीक पीस कर कपड़ छान कर शहतमें मिला कर काले रंगके लिये कोयलेकी बुकनी मिला कर बांसकी सींकोंमें लगा कर सुखाना चाहिये। कृति नं॰ २―मालावारी चन्दन १/४ छटांक, कृष्ण अगरू १/४ छटांक, चींड ४॥ छटांक, नखला ५ तोला, कौड़िया ऊद ५ तोला, अम्बर १/४ तोला, चोपचीनी ३ तोला, गहुला १ तोला, ब्राह्मी १ तोला, चीनी,२॥ तोला, अगरू ५॥ तोला, कस्तूरी १/४ तोला, इनको पीस छान कर नौ तोले शहदमें घोट कर बांसकी सीकमें लगाकर सुखा लेना चाहिये। कृति नं॰ ३―गोंदके पानीमें बुक्का मिला कर गाढ़ा बरक बनाना चाहिये और उसे सींक पर लगाकर सुखा कर चिकनी करनी चाहिये। उत्तम बत्तियाँ बनानी हो तो उस पर इत्र का हाथ फेर कर छाहमें सुखाना चाहिये। कृति नं॰ ४―नागरमोथा ४ तोला, कृष्णअगरू, ४ तोला, खस २ तोला, दालचीनी ४ तोला, तगर २ तोला, कचोरा २ तोला, बुरादा चन्दन १८ तोला, पत्थर फूल २ तोला, गह्वाला ६ तोला, गुलाबकली २ तोला, मैदान कड़ी ९ तोला, कस्तूरी १/४ तोला। इन सब पदार्थों में कस्तूरी तथा सिलारसको छोड़ कर सबको पीस कर कपड़छान करके काला बनानेके लिये कोयलेकी बुकनी तथा कस्तूरी और शिलारस मिला कर बनाना चाहिये। इसके लिये गोलसे अच्छी चौखूँ टी सींक होती है। क्योंकि गोल आकार पर पदार्थ उतनी अच्छी तरह नहीं चिपकते जितने चौरस पर चिपकते हैं। हाथमें कोयलेकी बुकनी लगाते रहना चाहिये जिससे वे पदार्थ हाथमें न चिपके। अगर-वत्ती बनानेकी कृति―कस्तूरी एक रत्ती, अम्बर दो रत्ती, चन्दन एक तोला, केसर १ तोला तगर २ तोला, कंकोल १/२ तोला, लौंगफूल १/२ तोला गवल १ तोला, अगरू २ तोला, ऊद १/२ तोला, शिलारस २ तोला, इलायची १ तोला, जायफल |
१/२ तोला, कोष्ठ कुलिअन १/२ तोला इत्यादि घोटकर अगरबत्ती बनती है। केसरकी गोली बनानेकी कृति―उत्तम केसर लाकर धूपमें सुखा कर उसे बारीक कूट लेना चाहिये। जब यह बुकनी हो जाये तो उसमें थोड़ा सा गुलाबजल डाल कर हाथमें कोई सुगन्धित इत्र इत्यादि लगा कर लम्बी लम्बी गोली बना लेना चाहिये। अष्टगन्ध―केसर, कस्तूरी, कपूर, गोरोचन, देवदार, कृष्णागरू, सफेद चन्दन और नागरमोथा अष्टगन्ध कहे जाते हैं। कृत्रिम कस्तूरी बनाना―एक ड्राम अम्बर तेल लेकर उसमें उससे चौगुना नमाम्ल (Nitric Acid) धीरे धीरे डालना चाहिये तदनन्तर काँच के चम्मचसे वह मिश्रणकर उस समय तक हिलाते रहना चाहिये जब तक यह पीला न हो जावे। इस क्रियासे उसमै असली कस्तूरीके समान सुगन्ध आने लगेगी। तदनन्तर उसमें १५ ग्रेन कस्तूरी मिलाना चाहिये। अगरजा बनानेकी विधि―नागरमोथा, गवला, जटामांसी, तज तथा खस का दो दो भाग पत्थर फूल, कृष्णागरू, जावित्री, लौंग, इलायची, चंदन, जायफल, कपूर कचरी और बचकाएक एक भाग, आधा भाग केसर और मोतिया, गुलाब तथा चन्दनका इत्र १/२ भाग लेना चाहिये। केसर, कस्तूरी तथा इत्रोंको छोड़ कर सबका कपड़छान करना चाहिये। इसके बाद केसर, कस्तूरी पीस कर उसमें मिला देनी चाहिये। तब उसमें इत्रकी पुट देनेसे अरगजा तयार हो जाता है। शरीरमें लगानेका उत्तम उबटन―बारीक दालचीनी इलायची, नागरमोथा, जावित्री, कचोरा, खस और कपूरको पानीमें पीस कर लगानेसे शरीरमें उत्तम सुगन्ध आने लगती है। दशांगकी गोलियाँ―हवाको सुगन्धित करने के लिये सुगन्धित पदार्थकी गोलियां बनाकर उसे जलाते हैं। इसके बनानेकी विधि इस भाँति है। उत्तम चन्दन ८ भाग, गुगुल ८ भाग, बाल तम्बोल २ भाग, धूप ४ भाग, कृष्णागरू ८ भाग, देवदार २ भाग, जायफल १/२ भाग, कोल कुलस्जन २ भाग, कपूर १/४ भाग, खस ३ भाग। उपरोक्त चीजे लेकर उनका कपड़छान करके घी में उनकी गोली बना लेना चाहिये। उपरोक्त कृतियोंसे तेल और सुगन्धित इत्र इत्यादि बनाये जाते हैं। किन्तु आधुनिक रासा- |
पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/१४३
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
अतर
अतर
ज्ञानकोष (अ)१३०