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कल्पनाको भी अधूरी ही छोड़नी पड़ती है। यद्यपि विद्युत्कणोंकी रचनाका विषय छोड़ भी दिया जाय तो भी इस दृष्टिसे कुछ गुण धर्मोंका स्पष्टीकरण करना आवश्यक है कि द्रव्य विद्युमय है। सेसक्तिस्वरूप Nature of Cohesion― तीसरी कल्पनाके अनुसार यह माना जाता है कि विद्युत्कण एक नियमित आकारमें मिले हुए हैं। स्फटिक शाखाके अध्ययनसे यह मालूम होगा कि उनके कौन कौनसे आकार होते हैं। रासायनिक आकर्षण-वास्तविक रासायनिक आकर्षण दो परमाणुओंमे होता है। इस परमाणुमें किसी जातिका एक या एककी अपेक्षा अधिक अनियमित विद्युत्कण होते हैं। किसी परमाणुमें ऋणविद्युकण अधिक होते हैं तो किसी में धनविद्युत्कण अधिक होते हैं। यदि ऐसे दो परमाणुओंका सानिध्य हो तो उनकी कमी यो अधिकता पूरी हो जाती है और एक (Neutral) तटस्थ अणु तयार होते हैं। किन्तु यह संयोग चिरस्थायी नहीं होता क्योंकि जहाँ यह संयोग होता है वहीसे छूट जाता है। केबल (Organic) कार्बनिक रसायनशास्त्रमें रसायनोंको चाहे जिस भाँति भिन्न भिन्न प्रकारसे पृथक करनेकी पद्धतियां प्रचलित हैं। घर्षणके योगसे इन अणुओंका विद्युत्सम्भार कम या अधिक होता है। जिसका वज़न अधिक होता है ऐसे स्थूल परमाणु स्वयं ही अस्थिर होते हैं। इस भाँति अस्थिर होने पर फिर स्थिर होनेके लिये वे अपनी भीतरी बनावट में परिवर्तन करते हैं। यह परिवर्तन होते समय आवश्यकतानुसार वे विद्युत्कणोंको बाहर फेंक देते हैं। इसी कारणसे किरण विसर्जन (Radio-activity) का दृश्य दर्शनीय होता है। अणु शक्ति (Molecular force)―रासायनिक संसक्तिको छोड़ कर अणु-संसक्तिका भी कुछ अंश होता है। इस अणु-संसक्तिका जोर ऐसे ही परमाणु पर चलता है जिस पर विद्युत्भार अथवा विद्युदणु नहीं होते।विद्युत्कणके सुव्यवस्थित रीतिसे रहते समय परमाणु पर छोटे २ रवे या गड्डे तयार होते हैं। यदि इस प्रकारके एक दूसरेमें रहने लायक दो रवे एक स्थान पर आ जाय तो दो परमाणु जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि इस प्रकारकी संलग्नता दृढ़ नहीं होती और साधारण अन्तर पर इस आकर्षणकी कुछ भी शक्ति नहीं होती किन्तु परमाणु ज्यो ज्यो निकट पहुँचते हैं त्यों त्यों यह आकर्षण
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अधिक होता है। मालूम होता है कि यह क्रिया विद्युच्छक्तिके कारण होती होगी। किन्तु इस प्रकारकी संसक्ति उन्हीं अणुओंमें होती है जो रासायनिक दृष्टिसे संवृत होते हैं। यह संसक्ति अन्तरमें स्थित धनविद्युत्कणोंकी एक दूसरे पर क्रिया और प्रति क्रियाके कारण होती है। अथवा यों कह सकते हैं कि यह कार्य अविशिष्ट स्नेहा-कर्षणसे होता है। यदि दो अणु अण्वन्तरके बाहर के हों और उनके आमनेसामनेके भाग यदि विरुद्ध विद्युद्धारसे भारी कर दिये जावें तो क्षण भरमें रासायनिक आकर्षणके समान आकर्षणसे संसक्ति शक्ति बढ़ेगी और अण्वन्तरकी अपेक्षा अधिक अन्तर पर इस संसक्ति-शक्ति का परिणाम देख पड़ेगा। परमाणुके ध्रुवी-भवनसे साधारण अणु शक्तिका औपक्रमिक अथवा रासायनिक स्नेहाक-र्षणमें रूपान्तर होता है। इन दोनों तरहकी शक्तियोंका ऊपर दी हुई तीसरी कल्पनासे विद्युतके ही आधार पर स्पष्टीकरण कर सकते हैं। परमाणुके रचनाके सम्बन्धमें कुछ और विचार―तीसरी कल्पना पर लोगोंका आक्षेप है कि उनके भागमें अन्यान्य प्रतिकार होने पर भी धन-विद्युत् पिण्ड एक ही स्थानमें कैसे रह सकता है। यह आक्षेप केवल धन-सम्बन्धी ही नहीं ऋण-सम्बन्धी भी हो सकता है। यदि वास्तव में इस आक्षेपमें कुछ तथ्य है तो यह कहना चाहिये कि विद्युत्कणोंके कुछ और भी भाग हैं, और अभी तक यही ज्ञान प्राप्त हो सका है कि भिन्न भिन्न विद्युत्कण एक दूसरेका प्रतिकार करते हैं। वे धन-विद्युत्भारसे आकर्षित भी होते हैं। किन्तु यह हम लोग नहीं जानते कि एक ही विद्युत्कणके विभाग एक दूसरेको दूर ढ़केल देते हैं। विद्युत्कणकी कार्य शक्ति-दिखलाने वाली रेखायें हर प्रकारसे बाहर ही रहनी चाहिये। उनका भीतर रहना आवश्यक नहीं। और सब विद्युत् क्रियाओंके लिये विद्युत्कणका अविभक्त रहना ही अच्छा है। दूसरा मत यह है कि हमलोग जिसे परमाणु कहते हैं वह केवल धन-विद्युत्का ही नहीं, साथ ऋण और धन, दोनों ही विद्युत्का कभी दूर न होने वाला पूर्ण मिश्रण है। वे वाह्य-पदार्थोसे कभी किसी तरह अकेले व्यवहार ही नहीं करते, बल्कि दोनों के मिश्रणके गुण-धर्मानुसार.व्यवहार करते हैं। उदाहरण-वास्तवमें जल, वायु तथा उज्ज दो पदार्थों से बना हुआ है, किन्तु जलका वाह्य शक्तिके साथ प्राण अथवा उज्जमें से किसी |
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अति परमाणु विद्युत्कण
अति परमाणु विद्युत्कण
ज्ञानकोश (अ)१४३