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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/१५७

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अति परमाणु विद्युत्कण
अति परमाणु विद्युत्कण
ज्ञानकोश (अ)१४४

एक स्वतन्त्र शक्तिके रूपमें व्यवहार नहीं होता, केवल जलरूपसे ही होता है। यही नियम उपरोक्त परमाणु पिण्डका भी है। इस जलमें ज्यों ज्यों प्राणके अधिक परमाणुओं समावेश होता है त्यों त्यों इस पर परमाणु के चारों ओर अधिकाधिक विद्युत्कण घूमते हैं। ऐसी अवस्थामें परमाणुओंको एकत्र करके पकड़नेके लिये शक्ति रेखायें भीतरकी ओरसे जाती हैं, बाहर की ओरसे नहीं जातीं। इसी कारण किसी निकटस्थ दूसरे परमाणुओं पर उसका परिणाम नहीं होता। इसके भार रहित होने के लिये और इसी प्रकार प्रत्यक्ष विश्लेषणके सिवाय उनके पृथक्करणके लिये और कोई मार्ग ही नहीं रह जाता।

(१६) किरण विसर्जन―प्रत्येक पदार्थके परमाणुके चारों तरफ विद्युत्कण रहते हैं और वे उसके कक्ष में भ्रमण करते हैं। यदि यही बात है तो प्रश्न उठता है कि क्या वे निरन्तर किरण विक्षेप किया करते हैं, क्योंकि घूमने वाले विद्युत्भार एक प्रकारके विसर्जक हैं। और कम या अधिक प्रमाणमें विसर्जन भी किया करते हैं इस कारणसे उनकी गति-शक्ति नष्ट होती है और अन्तमें वे शान्त हो जाते हैं। अथवा उनका परिवर्तन दूसरे रूपमें हो जाता है। आधुनिक प्रयोग करने वालोंको कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे केवल उपरोक्त रीतिसे क्रिया होनेवालों का विसर्जन एकही प्रकारका नहीं बल्कि बहुत प्रकारका होता है।

पहला प्रकार―यह राँटजेन किरणके समान लहरके रूपमें होती है। इनको ‘ग’ किरण कहते हैं।

दूसरा प्रकार―ऋण ध्रुव किरणके समान एक किरण। इसमें प्रत्यक्ष विद्युत्कणही रहते हैं। इनको ‘ब’ किरण कहते हैं।

तीसरा प्रकार―इसमें विद्युत्भार सहित विद्युदणु, परमाणु अथवा अर्ध परमाणु प्रायः सौर (हेलियम) वायुके स्वरूपके होते हैं। ये दूर फेंक दिये जाते हैं। इनको ‘अ’ किरण कहते हैं।

चौथा प्रकार―इन सब विसर्जनोंके अनन्तर विद्युद्भार-रहित अवशिष्ट भागसे गंधकके रूपमें निकलता है।

जिन पदार्थों के परमाणुका वजन अधिक होता है उनमें उपरोक्त प्रकार के विसर्जन होते हैं। इसका कारण अत्यन्त वेगयुक्त अंतः क्षोभ है। जिससे राँटजेन किरण निकलती हैं।

आघातके कारण होने वाली किरण विसर्जन क्रियाओंको तो स्वीकार करना ही पड़ेगा, किन्तु

जिस कारणसे विद्युत्कण कक्ष भ्रमण करते हैं, उसी कारणसे उन पदार्थों की तरफ़से भी विक्षेपण क्यों नहीं होता, जिन पदार्थोंके परमाणुका वजन थोड़ा है। इसका उत्तर इन प्रकार दिया जा सकता है कि इन पदार्थों में विसर्जक अलग अलग नहीं होता, और पृष्ठ भाग पर का विसर्जन उनके योगसे होता है जो भीतरकी ओर रहते हैं। ये विसर्जक संख्यामें भी अधिक रहते हैं, और यदि एकसे अधिक विसर्जक हो तो उनके व्यक्तिशः विसर्जनसे अन्यान्य विसर्जनका नाश होता है; और इसी कारण बाह्य परिणाम कुछ भी नहीं दिखाई पड़ सकता।

यदि वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो उष्णता मान कम होने के कारण पदार्थों से किरण विसर्जन होता है। और यदि शक्तिक्षय न होती हो तो उसका कारण आयात और निर्यात् अथवा ग्रहण और विसर्जनका समान होना ही कह सकते हैं। यह बात नहीं है कि विसर्जन रुक जाता है। यदि यह देखना हो कि इस प्रकारले कितना विसर्जन होता है तो जिस पदार्थके विसर्जन का हिसाब जानना हो उस पदार्थको शून्यांश उष्णताकी जगह रखना चाहिये क्योंकि उस जगह वह किसी प्रकार की शक्ति ग्रहण न कर सकेगा। जो कुछ भी होगा वह सब विसर्जन ही द्वारा होगा।

यदि अन्तः शक्ति व्यय करते हुए किरण विसर्जन होता हो तो परमाणु स्थिर न होंगे बल्कि क्षणिक और अस्थिर होने लगेंगे, और उनमें अन्त स्फोटका होना भी स्वाभाविक होगा। सब परमाणुओंको इस दृष्टिसे एक ही प्रकारका व्यवहार करना चाहिये। किरण विसर्जनका बिषय बहुत गहन है। इसलिये उसके विस्तृत विवेचन करने का यहाँ विचार नहीं है।

कुछ ऐसे पदार्थों का भी किरण विसर्जन होता है, जिनके योगसे विद्युत उत्पन्न होकर छाया चित्र बनाने के लिये तैयार किये हुए शीशे पर परिणाम उत्पन्न करती है। बहुतसे पदार्थ विद्युत्कण अवथा विद्युदणुके सदृश कण फेंकतें हैं। जिस समय यह फेके हुए कण फोटोके प्लेट पर गिरते हैं, उस समयके उनके आघातके योग से विद्युत् रंग उत्पन्न करते हैं और इस योगसे उस शिशेके टुकड़े पर लगाये हुए राजतक्षार पर परिणाम होता है। ये गुण वरुण (युरेनियम), रद (रेडियम) इत्यादि उन धातुओंमें ही नहीं होते जिनके परमाणु वजनी होते है किन्तु और सब पदार्थों में होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है