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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२१३

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अदवनी शहर
अदवनी शहर
ज्ञानकोश (अ) १९०

बन्द करके अमीर उमरावसे संधिही करते हैं, सो उसीके अनुसार करिये। पैसे के विषयमै कुछ न कहिये।

(रा. खं. १९-५५-४०)

कृष्णरावको भेजे हुए (ज्येष्ठ व॥१०-१७०२) के पत्रमें अदवनी हवेली थानोंके संबंध उल्लेख है।

(रा. खं. १९-३६४-१०८)

भाद्रपद व ॥२ शक सं॰ १७०२। रामचंद्र रिसवुडका नाना फरनवीसको भेजे हुए पत्रसे विदित होता है कि वसालत जंग अदवनीके समीप ठहरा है और सब ठीक है (रा. खं, १५-२५-१८३) यद्यपि शक संवत् १७०८में मरहठोंने अदवनीकी रक्षाकी, तथापि वे शक सं. १७०८ (सन् १७८६ ई॰) में वैसा न कर सके। उस समय टीपूने वह किला ले ही लिया। बालदेव-शास्त्री उसके संबंधमै इस प्रकार लिखते हैं। (ऐ. ले स. पृ॰. ४०५३-५)

“बदामी पर कब्जा होनेके बाद हरिपंत ताँतिया मई महीनेके अन्तमें ‘वहाँसे कूच करके गजेन्द्र गढ़ की ओर गये। पैदल सिपाहियोंकी दो छोटी फ़ौज़ उस किलेका मोर्चा लेने के बाद टीपूके यहाँसे मदद के लिए आ रही थीं। किन्तु उन मरहठे सवारों ने उन्हें बीचहीमें रोक कर सबको खतम कर दिया। उसके बाद किलेदारोने घोर पाड़ेके मार्फत बातचीत करना आरम्भ किया। आठ दिन तक वादा विवाद होनेके बाद किला स्वाधीन होनेही को था कि इतने में यकायक यह खबर आई कि टीपूने अदवनीको घेर लिया है। पाठकों को पहले बताई हुई यह बात यादही होगी कि अदवनी राज्य निज़ाम अलीके भाई वसालत जंग का था। वसालत जंग इस समय मर चुके थे और उनके पुत्र मुहब्बत जंग अपने बाल बच्चों के साथ अदवनीमे थे। टीपूने उस किले पर घेरा डाल कर बहुत तंग किया। परन्तु मुहब्बत जंग जी तोड़ कर लड़ा और शत्रुओंके दो हमले रद्द किये। मुहब्बत जंगने अपने चचा याने निज़ाम अलीसे प्रार्थनाकी कि यदि वे मदद न करेंगे तो वह बाल बच्चों सहित शत्रुके हाथमें पड़ जायेगा; इसलिये यदि अपने कुलकी आबरू बचानी हो तो अथवा कमसे कम अपने घरकी स्त्रियाँ टीपूके हाथमें जानेसे बचानेके लिये तो सेना भेज कर सहायता करिये। निजाम अलीने तत्काल अपने छोटे भाई मुगल अलीके साथ पञ्चीस हज़ार फ़ौज रवानाकी, और हरिपन्त ताँतियाको पत्र भेजा कि

वह अपनी सेना तथा मोगल अलीके साथ शीघ्र ही अदवनीमें जाकर टीपूका घेरा हटाये। पत्र आतेही ताँतियाने गजेन्द्र गढ़ विजय करनेके लिये १/३ सेना अपने पास रख कर करीब २/३ सेना ९ जून को अदवनीकी तरफ रवानाकी। उस सेनाके मुख्य सरदार अप्पा बलवंतराव थे और उनके आधीन बाजीपन्त अप्पा, रधुनाथ नीलकण्ठ पद-वर्धन तथा मुगल सेना सहित तहब्वर जंग सरदार नियुक्त किये गये थे। भागा नगरसे मुगल अली आये थे। उन्हें अप्पा बलवन्तने शामिल कर लिया और अदवनीको ओर तेजीसे रवाना हो गये। उनके वहाँ पहुँचतेही टीपू घेरा उठा कर तीन कोस पीछे हटा। तारीख २२ जूनको तीनों सरदार, अप्पा बलवन्त, बाजीपन्त तथा रघुनाथ राव पटवर्धन तैयार होकर टीपू पर चढ़ आये। टीपूने सेनाके आगे हजार बारह सौ सवार रक्खे थे। मरहठोंने उन्हें मार भगाया और उसके सौ डेढ़सौ घोड़े छीन लिये। इतनेमें टीपू सुलतान पैदल सिपाही तथा तोपोंको लेकर शिविरसे निकला और गोले बरसाने लगा। सूर्यास्त तक युद्ध होता रहा और अंतमें मरहठोने टीपूका पीछा करते हुए शिवर तक हटा दिया। इतना युद्ध हुआ तो भी मुगलोकी चालीस पचास हज़ार सेना शिविरमेही बैठी युद्धका तमाशा देखती रही। मराठोकी उसने तनिकभी सहायता नहीं की।

अप्पा बलवन्तके निकल जाने पर दो दिनके बाद गजेन्द्र गढ़ हरिपंत ताँतियाके हाथमें आ गया। फिर वे भी अदवनीकी ओर गई हुई सेनाका पीछा करने के लिये वहाँसे निकल कर कवताल भानू तक गये। वे दिन अंतके थे तोभी ताँतिया विचारता था कि तुंगभद्राको उत्तरतट पर थोड़ी सेना रख कर दूसरी ओर जाँय और दूसरी ओर की सेनाके साथ टीपू पर चढ़ाई कर दें और उस के देशमें उधम मचा दें। उस साल इस प्रतिमे मृग नक्षत्रकी वर्षा नहीं हुई थी। यदि आगे एक दो नक्षत्र पानी न बरसता होता तो ताँतियाकी योजना सफल होती और शायद चार मास तक मुगल तथा मराठी सेनाओंकी छावनीभी उधरही हुई होती। परन्तु आर्द्रा नक्षत्रकी वर्षा जोरोंसे होनेके कारण ताँतियाका दूसरी ओर जानेका विवार एकही और रह गया और उसे इस बात की चिंता होने लगी कि जो दूसरी ओर अकेली फौज़ अदवनीकी सहायताके लिये भेजी गई थी, वह कहीं नदीमें बाढ़ आनेसे दूसरी ओरही न रह जाय। ऐसे झञ्झटके दिनों में टीपूने अदवनीको