सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२३६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
अनननास
अनन्त
ज्ञानकोश (अ) २१३

अकुर निकलने लगते हैं। इससे पैदावार अच्छी होती है। इस सम्बन्धमै निकोलस साहबके बतलाये हुये खेतीके तरीके नीचे दिये जाते हैं:—

छः छः फुटकी दूरी पर पंक्तियां खींचनी चाहिये, और प्रत्येक पंक्तिमें कमसे कम तीन फीटके अन्तर पर पौधे लगाने चाहिये। इस प्रकार एक एकड़ जमीनमें २५०० पौधे लग सकते हैं। पहली फसल आतेही पौधेके लगभग चार अंकुर छोड़कर शेष काट डालने चाहिये। इससे दूसरी फसलमें १०००० फल उत्पन्न होगें। पौधे कॅटीले होनेके कारण बीचमें काम करनेके लिये आवश्यक स्थान पंक्तिके मध्यमें रखना चाहिये। इसके अतिरिक्त, दो पक्तियों में अधिक अन्तरके रखनेसे पुराने पौधे उखाड़कर नए पौधे दोनों पक्तियों के बीचमें लगाये जा सकते हैं। इसतरह एकही जगह पर कई फसलें उत्पन्न हो सकती हैं।

वेस्टइण्डीज़में खेतीके आठ या नौ मास बाद फल तय्यार हो जाते हैं। फिरंगर का मत है कि भारतके दक्षिण भागमें अगस्तमें इसकी खेती करनी चाहिये। फरवरी और मार्चमें पोधोंमें फूल आ जाते हैं। जूलाई तथा अगस्तमें फल पकना आरम्भ होजाता है, तथा सितम्बर अक्तूबर में वे बढ़ कर पूर्ण तय्यार हो जाते हैं। कभी कभी जब फूल आनेमें देरी हो जाती है तो जाड़े में फल तय्यार होते हैं। भलीभाँति पकनेके लिये उष्णता की आवश्यकता होनेके कारण जाड़ेंमें यह अच्छे नहीं पक पाते, अतः स्वाद में भी ये खट्टे तथा अप्रिय लगते हैं। बुडरोका कथन है कि उत्तम प्रकारके पौधोंकी खेती जनवरीसे मार्चतक बम्बई प्रान्तमें करनी चाहिये ओर अंकुर फूटने तक बराबर पानी देते रहना चाहिये।

फलपूरा परिपक्व होनेके पूर्व ही उसे तेज, चाकूसे काटना चाहिये। यदि कहीं दूर फल भेजना हो तो प्रत्येक फलको घास अथवा कागज़ में लपेटना चाहिये। दो अथवा तीनसे अधिक फलोंको एकमें नहीं बाँधना चाहिये। फल दबने अथवा अधिक पकनेसे सड़नेका डर रहता है। एक फल सड़नेसे सब फल खराब हो जाते हैं।

धागा तय्यार करना—पत्तोंसे उत्तम धागा निकलता है। फिलीपाइन द्वीपमें एक (Pina) पाइना नामक कपड़ा इससे तय्यार करते हैं जो मलमल के समान होता है। उत्तर बङ्गालके रङ्गापुर जिले के चमार जूते सीनेके लिये इसीसे धागा तय्यार करते हैं। इसलिये धागेकी वहाँ अधिक माँग रहती है। गोवाकी ओर लोग धागेके कण्ठे

(Necklace) गलेमें पहनते हैं। खासिया पहाड़ी के अननासके धागेसे तय्यारकी हुई थैलीको बाँलिच नामक एक गृहस्थने १८३६ ई॰ में खरीदी थी। इससे स्पष्ट है कि यहाँ के लोग धागाका उपयोग पहले भी जानते थे। सन् १८८७ ई॰ में (East Indian Association) ईस्ट इण्डियन असोशियेशनके सन्मुख वेन्टन साहब ने आसामके व्यापारके सम्बन्धमें भाषण देते हुए कहा था कि सिलहट में अनननास, उसके पत्तोंके धागे तथा उससे मद्यार्कका व्यापार किया जा सकता है। हाल ही में सर॰ जे॰ बकिन्धमने आसामी धागेको लंदनके (Impirial Institute) इम्पीरियल इन्स्टीट्यूट में परीक्षार्थ भेजा था। वह धागा परीक्षामें अति उत्तम ठहरा। इसके एक टन का मूल्य २० से २५ पौण्ड तक हो सकता है। अन्य देशोंकी अपेक्षा यहाँ तो अनननाससे भाँति भाँतिके लाभकी ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता इसका यदि पूर्ण उपयोग किया जावे तो अत्यन्त लाभ हो सकता है। इसका औषधिरूपमें अनेक उपयोग होसका है। इससे मर्द्याक और सिरका भी तय्यार होता।

औषधिगुणधर्म—अनननासके पत्ते का रस पेट की कृमियोंके नाशके लिये बड़ा लाभदायक है। दन्तविकारोंमें फलका सेवन करना चाहिये। चीनी के साथ ताजे पत्तोंका रस पिलानेसे हिचकी बन्द हो जाती है। कुछका मत है कि अनननासके रससे गर्भपात हो जाता है। कच्चे अनननासका सेवन करनेसे स्तम्भित ऋतु-स्राव ठीक समय पर होने लगता है। इसके सफेद भागके रसको चीनी मिलाकर पीनेसे पेटकी कीड़ी गिर जाती है। पक्के फलका रस सेवन करनेसे पीलियामें लाभ होता है। अनननासके पत्ते के धागोंसे उत्तम तथा मजबूत कपड़ा बनाया जासकता है। सिंघापुरके लिफोर्निया इत्यादि स्थानोंसे अनननासका मुरब्बा बाहर भेजा जाता है। इसी प्रकार यह व्यापार भारतके मालाबार इत्यादि प्रान्तोंसे बड़े सफलता पूर्वक किया जा सकता है।

अनन्त——(१) परमेश्वरका एक नाम। (२) एक कदुपुत्र। (३) कभी कभी यह शब्द शेषनागके लिये भी व्यवहारमें लाते हैं। (४) अनन्त चतुर्दशीको पूजा करके हाथमें बाँधा जानेवाला २४ गाँठका एक डोरा। इसी प्रकार यह स्त्रियों के बायें हाथमें भी बाँधा जाता है।

अनन्तव्रत——यह एक मुख्य भारतीय व्रत है। प्रति वर्ष भाद्रसुदी चतुर्दशीको इस व्रतका पालन