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अवश्य है। पहला सिद्धान्त वर्ल्केह्यू मके अन्तःसृष्टि विषयक कल्पना वाद् (Subjective Idealistic) से मिलता जुलता है। किन्तु फ्रीगे इत्यादिने इसका खूब खण्डन किया है। दूसरे सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे यह स्पष्ट विदित होता है कि संभवनीय विषय और सच्ची वस्तुस्थितिमै भेद होनेसे उपरोक्त सिद्धान्त भी नहीं ठहर सकता। तीसरे सिद्धान्तमें केवल यही है कि कोई भी बात किसी मानी हुई बानसे कम अथवा अधिक प्रमाणमें वाह्यसृष्टि विषयक (Objective) स्वरूपमें होती है। उदाहरण के लिये किन्नर नामक कल्पित जीवधारीको लीजिये। (किन्नर—यह एक कल्पित गन्धर्वोकी एक जाति विशेष है जिसका शरीर मनुष्यके और मुख अश्वके समान होता है)। अतः: ऐसा कोई खास नियम नहीं है कि इसी प्रकार की कल्पना वाह्य सृष्टि में जो बातें कभी नहीं हुई हैं उन बातोंके विषयमें नहीं की जासकती हो। उदाहरण के लिये कह सकते हैं कि कोईभी संख्या विभाज्य होगी। यही विभाग पद्धति अन्य वस्तुओं के सम्बन्धमें भी लग सकती हैं। मेढोंके एक झुण्ड के दो भाग किये जा सकते हैं। उस भागसे पुनः दो भाग हो सकते हैं इसी भाँति कई बार यह क्रिया की जासकती है। परन्तु शीघ्रही एक ऐसी अवस्था आवेगी कि जब मेढोंका नाश किये बिना यह भाग-क्रिया असम्भव होगा। निस्सन्देह, इस अन्तर्विभागकी कल्पनामें भी कुछ सत्यार्थकी झलक है। यद्यपि इस कल्पना का अर्थ मेढोंके विभाग में भी न हो किन्तु उनके मूल्य इत्यादिके सम्बन्धमें तो लागू हो ही सकती है। इसी भाँति गणितशास्त्रकी दृष्टिसे तो अनन्त संख्याकी कल्पना का बहुत कुछ महत्व है ही। चाहे यह एक गूढ समस्या ही रह जाय कि उपरोक्त सिद्धान्त किन पदार्थोंपर और कहां ठीक बैठेगा। अनन्त-विस्तार—अनन्त-विस्तार के विषयमें सामान्य कल्पना है कि अवकाश (Space), काल (Time) और वे पदार्थ जो अस्तित्वमें हैं, अथवा जिन पर वे निर्भर हैं ऐसे पदार्थ क्रमानुसार इस कल्पनापर निर्भर हैं। यदि औप-चारिक रीतिसे कहा जाय तो ऐसे क्रमका किसी विशेष स्थान पर रुकनेका कोई कारण नहीं है। क्योंकि इस क्रमको चाहे जहाँ तक बढ़ाया जा सकता है, किन्तु अन्तमें उससे भी अधिक विस्तार हो ही सकता है। किन्तु अस्तित्वके सभी विषय इस प्रकारके नहीं होते। उदाहरणके लिये वर्णमालाके अक्षरों को ले सकते हैं। ‘अ’ के पूर्व कोई |
वर्ण नहीं हैं। उसी भाँति क्रमसे ‘आ’ ‘ई’ इत्यादि का निश्चित स्थान है। इस प्रकार का क्रम और सीमा मनुष्य के बनाये हुए रूढ़िपर अवलम्बित है। दूसरी ओर रङ्ग का उदाहरण लीजिये। वर्णमाला की भाँति इसका आदि अन्त कहना कठिन है क्योंकि यह रूढिकृत नहीं है बल्कि प्रकृति-नियमित है। इस प्रकार भी कल्पना तो की जा सकती है कि कोई एक ऐसी घटना होगी जिसके पूर्व दूसरी कोई भी घटना नहीं घटी होगी। इसी भाँति आकाशमें कोई न कोई तो एक ऐसा नक्षत्र अवश्य ही होगा जिसके पश्चिम कोईभी दूसरा नक्षत्र न होगा। इस भाँति की कल्पनाओमें भी अनेक अडचने पड़ती है। ल्यूकेशियसने ऐसी कई शंकायें सन्मुख उपस्थितकी हैं। उसका प्रश्न है कि यदि कोई मनुष्य विश्वके बिल्कुल सिरे पर खड़ा है और दूसरा उसे बाण मारे तो उसमें बाधा कहाँसे पड़ेगी। इसका इतना उत्तर हो सकता है कि यद्यपि इस विशाल अन्तर में बाधा उत्पन्न करने वाली कोईभी वस्तु नहीं है तथापि विश्वके एक सिरेपर जानाही मानवशक्तिसे असमम्भव है। उसी प्रकार यदि अन्तर (Distance) द्वारा रुकाचट करनेका साधन न हो तो कुल विश्वकी घटनामें ही प्रतिबन्धक स्थिति होगी। प्रसिद्ध तत्ववेत्ता कॉन्टने कालके विषयमें इससे अधिक विचारणीय बाधायें उपस्थित की हैं। सीमा-सम्बन्धी कालकी जो कल्पनाये हैं, वे और भी अधिक जटिल हैं। अनन्त-विभाग——अनन्त-विस्तार की कल्पनाके विरुद्ध जो आक्षेप किये गये हैं उनकी अपेक्षा अनन्त-विभागको कल्पनाके विरुद्ध अधिक स्पष्ट आक्षेप हैं। अन्त-रहित पूर्णत्व को कल्पनामें जो बाधायें हैं, वे सब तो इसमें हैं ही, इसके अतिरिक्त इस विषयकी कल्पनामें सीमा अथवा मर्यादा मान लेनी पड़ती है। जब हम किसी वस्तु विशेष के अनन्त भाग करनेकी कल्पना करते ह उस समय यह भी कल्पना करना आवश्यक है कि प्रत्येक भाग अनन्त अंशसे सूक्ष्म हो। इसी लिये कॉन्ट का कथन है कि कोई एक विशेषक्रम अनियमित रीति से अन्त-रहित मानना नहीं चाहिये, किन्तु पूर्णत्व सब और पूर्ण मानना चाहिये। कॉन्टके इस मत में केवल यही दोष देख पड़ता है कि विभाज्य द्रव्यको वह एकही रूप मान लेता है और यदि कोई पदार्थ एक रूप ही हो तो उसको वह एकही रीतिसे विभाज्य मान लेता है। किन्तु ऐसी कल्पना करनेसे यह प्रश्न उठता है कि वह पदार्थ पूर्णरूप |
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अनन्तत्व
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ज्ञानकोश (अ)२१७
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