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अनन्तपुर गाँव—जिले, विभाग और ताल्लुकेका मुख्य स्थान। यह उ॰ अ॰ १४°११` और पू॰ रे॰ ७७°३७` में स्थित है। सदर्न मरहठा रेलवेके गुंटकल बंगलोर शाखापर यह स्टेशन है। यहाँकी जनसंख्या १९२१ में ११४५२ थी। विजयनगरके राजाके दीवान चिकण्णा उड़ियारने यह गाँव १३६४ ई॰ में बसाया था, और उसको अपनी पत्नी “अनन्ता” के नामसे विख्यात किया। इसी चिकण्णाने उसी समय अनन्तपुरमें एक बड़ा तालाब बनवाया। इस तालाबमें पंदामेरू नदी आकर मिलती है। विजय नगरके राजासे हनुमप्पा नायडूके हंडे घरानेको इस विभागकी सनद सोलहवीं शताब्दीमें मिली। इस घराने के पास यह प्रदेश दो शताब्दी तक था। १७५७ ई॰ में गुत्तोके संस्थानिक मुराररावने इस गाँवपर घेरा डाला; परन्तु ५००००) मिलनेपर उसने यह घेरा उठा लिया। १७७५ ई॰ में हैदरने गुत्तो और बल्लोरी जीतकर इन भागों में से ६६०००) वसूल किया, वहाँ के पालेगारको यह रकम न दे सकने के कारण हैदरने उसे कैद किया और उसका प्रदेश अपने राज्यमें मिला लिया। इसके बाद वह वंश कभी सिर न उठा सका। १७८८ ई॰ में वयोवृद्ध पालेगारका देहान्त हो गया, इसके बाद टीपूने शीघ्र ही इस घरानेके कुल मनुष्योंको फाँसीकी आज्ञा सुनायी, जिससे फिर वे दुःख न पहुँचा सकें और उनको गाँवके बाहर फाँसीपर लटकाया गया। उस बूढ़े पालेगारका तीसरा पुत्र श्रीरङ्ग-पट्टणमें था। उसने भागकर कालहस्तिके राजा का आश्रय लिया। १७९९ ई॰ में वह अनन्तपुर को लौट आया; परन्तु वह शीघ्र ही निजामकी शरणमें आया। निजामने उसको सिद्दनामपुर गाँव इनाममें दिया। १८०१ ई॰ में उसकी मृत्यु होने के बाद मुख्य शाखाका अन्त हो गया। १८६९ ई॰ में यहाँ म्युनिसीपैलिटी स्थापित हुई, १९०३-४ ई॰ में आय १७५००) और व्यय १६०००) था। अनन्तपुरके चारों ओर बगीचे हैं, इस कारण वहाँ की हवा स्वास्थ्य के विचार से खराब है। युरोपियन लोग अच्छी जगह बसे हैं। यहाँ लगभग २०-२९ इंच वर्षा होती है। यहाँ एक डाकबङ्गला, एक कालेज, तीन हाईस्कूल, सरकारी ट्रेनिंगस्कूल तथा और भी स्कूल हैं। एक जिनिंगका कारखाना है, अनाज लोहे और फुटकर मालका व्यापार होता है। मुख्य पुलिस कचहरी, मेजिस्ट्रेट कोर्ट और दूसरी श्रेणीके काराग्रह इत्यादि हैं, [इं॰ गॅ॰ ५ अर्नोल्ड ई॰ |
गाइड सेसंसरिपोर्ट] अनन्तपुर—मैसूर राज्यके शिमोगा जिलेके ताल्लुकेका एक गाँव है। यह उ॰ अ॰ १४°५ और पू॰ रे॰ ७५°१३ में स्थित है। लोक संख्या यहाँकी चार सौ है, पहल इसका नाम अन्धासुर था और यह एक महत्वकी जगह थी। अन्धासुर नामक राजाने इसे बसाया था। आगे आठवीं शताब्दीमें हुचा राज्यके संस्थापक जिनदत्तने अन्धासुरको जीता। ग्यारहवीं शताब्दीमें अन्धासुर चालुक्योंके राज्य में शामिल था। १०४२ ई॰ में १२०० ब्राह्मणोंको इस गाँवका अग्रहार बनाया गया। १०७९ ई॰ तक यह राजधानी थी। सत्रहवीं शताब्दी केलदी राजा वैकंटप्पा नाइकने शिवाचार मठ स्थापित किया, चंपकसर नामक तालाब बनवाया ओर गाँवका नाम आनन्दपुर रक्खा। आजकल उसका रूपान्तर अनन्तपुर हुआ। हैदर और टीपू के समय में इस गाँवपर अनेक बार चढ़ाइयाँ हुई थीं। (इं॰ ग॰ ५) अनन्त फंदी——नगर प्रान्तमें संगमनेर नामक एक बड़ा गाँव है। वहींका यह निवासी था, यह बाजसनी ब्राह्मण था और इसका गोत्र कोडिण्य था, इसके पिताका नाम कवानीबाब, माँ का नाम राजूवाई (राऊबाई महाराष्ट्र)। कविचरित्र; संत-कविकाव्य सूचीकार “गउवाई” लिखती हैं, यह कदाचित् मुद्रक दोष होगा इसका (उपनाम) धोलप था। संगमनेरमें एक मलीक फंदी नामक विलक्षण फकीर था उससे इसका बहुत स्नेह होने के कारण लोगोंने उसका फंदी उपपद इसके नाम के साथ जोड़ा और तबसे इसका यह नाम पड़ा। इसका जन्म शक १६६६ के रक्ताक्षि नामक संवत्सरमें हुआ था और मरनेके समय उसकी अवस्था ७५ वर्ष की थी। उस समय शालिवाहन शक १७४१ था। अनन्त फंदी पहले तमाशे करता फिरता था और अपनी बनाई हुई लावनी गाकर लड़केको नचाता था। एक समय अहिल्याबाई होलकर संगमनेरमें ठहरी थी। उसको इसका पता लगा और उसका बुलाकर कहा कि जो कृत्य आप करते हैं वह ब्राह्मणके लिए उचित नहीं हैं, तबसे इसने तमाशा करना छोड़कर कीर्तन करना आरम्भ किया। अनन्त फंदीके होलकर राज्यमें जानेपर बाईने तमाशेके बदले कीर्तन करनेका उपदेश दिया था। इसके बाद लोकाग्रहसे एक अवसरपर अनन्त फंदीके एक बार फिर तमाशा आरम्भ करनेपर एकाएक संगमनेरमें अहिल्याबाई की सवारी आई, और |
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अनन्तपुर गाँव
अनन्त फँदी
ज्ञानकोश (अ) २२२