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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२४६

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अनन्त मूल
अनयमुड़ी
ज्ञानकोष (अ) २२३

यह निश्चय होनेपर कि फंदी तमाशा कर रहा है उस का धड़ सिरसे अलग करनेकी उन्होंने प्राज्ञा दी। यह समाचार तमाशेमे फंदीको मिलते ही उसने तमाशेको कीर्तनमें परिवर्तन कर दिया। तब बाई प्रसन्न होकर और फंदीको इनाम देकर आगे बढ़ीं। (म॰ कविचरित्र)

अनन्तमूल—अनन्तमूल, अनन्तवेल सुगंधि-वाला, सारिवा (संस्कृत) मग्रबू, उपलसरि, नन्नरि इत्यादि इस बनस्पतिको अनेक नामसे पुकारते हैं। उत्तर हिन्दुस्थान, बंगाल प्रान्त तथा दक्षिणमें ट्रावनकोरसे सिलोन तकके सब प्रदेशों में पाई जाती है।

अंग्रेजी सार्सापरिलाके जोड़का रक्त शुद्ध करने का गुण इस वनस्पति में है, इस कारण इसका एतद्देशीय औषधियों में उपयोग किया जाता है। बहुधा काढ़ा अथवा पाकके रूपमें अनन्तमूल देते हैं। सूजन कम करने के लिये, स्वास्थ्यवृद्धिके लिये और मूत्ररेचक होनेके कारण इसका उपयोग होता है। अग्निमांद्य, ज्वर, रक्तदोष, उपदंशादि विकारोंपर भी अनन्तमूल देते हैं। कभी कभी अनन्त बेलकी बुकनी करके चावलके (खुद्दी) में डालते हैं या सूखे पत्तोंका काढ़ा पकाते हैं, बाजारों में इसकी छोटी छोटी गड्डियाँ मिलती है। उसमें एक अथवा अधिक पेड़ोंकी जड़ें बाँधी हुई रहती हैं, अनन्त मूल १२ आना या १ रुपये सेर मिलता है। यूरोप में अनन्तमूल फी पाउंड डेढ़ या दो शिलिंगको मिलता है, [बॅट, पदे; Ayurvedic system of medicine by N. N. Sen Gupta Vol. III]

अनंतराम—इसने ‘स्वानुभूति’ नामक नाटक अन्योक्तिपर लिखा था।

अनंतशयन—_यह ट्रावनकोरमें विष्णुका स्थान है, यहाँ पर १४ हाथ लम्बी विष्णुकी मूर्ति है जो शेष पर शयन करती है। इस कारण इसका नाम यह पड़ा है। आनंद गिरि अपने शंकर विजय में लिखते हैं कि जब भगवत्पूज्यपाद श्रीमच्छंक- राचार्य दिग्विजय करते हुए यहाँ आये, और देव दर्शन कर एक महीने भर रहे थे और उनको उपनयनादि संस्कारहीन विष्णुशर्मादिक ऐसे छ: प्रकारके वैष्णव मिले तब आचार्यजीने उनको उपदेश दिया और फिरसे ब्राह्मणत्वमें लाये। पेशवाके समयमें भी यह देवस्थान प्रसिद्ध था और उस समयके पत्रों में इसका उल्लेख है,

अनंतसुत मुद्गल—(कृष्णदास मुद्गल) महीपति बाबाका कथन है कि यह नाथ महाराजके एक वर्ष पूर्व समाधिस्थ हुए होंगे। उस समय समाधि

शक १५२० था। ग्रंथ-रामायण, रुक्मिणी स्वयंवर, कालिया-मर्दन (सं॰ क॰ का॰ सु॰)

अनंतसुत——(विठ्ठल) यह कवि करीब ७० वर्ष पूर्व बड़ौदामें हुआ था। इसके पिता अनंत हांगा नदीके किनारे पिपल गाँवमें रहते थे। वे पिंपल तथा तीन अन्य गाँवोंके जोशी और पटवारी थे। विट्ठलकी माँ का नाम राधाबाई था। उसका देहान्त होनेके पश्चात् अनंतने सन्यास ग्रहण किया। विट्ठलने पिताको ही गुरु किया था, अनंतसुतका “दत्तप्रवोध” नामक एकही ग्रंथ प्रसिद्ध है।

अनमदेश—यह पिंपल राजके दक्षिणमें (रेवा कांठा मु॰ इ॰) और मानसेलके बीचका स्थान है। पहिले सुलतान अहमद (१४११-१४४३) के मित्र शेख अहमदके जन्म दिवसके उपलक्ष्य में बनायी हुई मसजिद यहां है।

अनयमलय—यह उ॰ अ॰ १०°१५` से १०°३१` और पू॰ रे॰ ७६°५७` से ७७°२०` में स्थित है। मद्रास प्रान्तके कोयमबटूर जिलेमें फैले हुए सह्याद्रि पर्वतका एक भाग है। इसे हाथीका पहाड़ भी कहते हैं। इस पहाड़की हवा नीलगिरि पहाड़की हवासे मिलती जुलती है। इस पहाड़की दो पक्तियाँ हैं; एक नीचे और एक ऊपर। नीचेकी पंक्तिकी ऊंचाई ३००० से ४५०० फीट है और ऊपरकी पंक्तिकी ऊंचाई ७००० फीट तक है। नीचे के पहाड़की ढालपर १८५०० एकड़ जमीन कहवा दोनेके लिये तैयार की गई है। पहाड़पर सुन्दर जंगल हैं। यहाँका सागवान मशहूर है। पहाड़ परसे सागवान लानेका काम हाथियोंसे लिया जाता है। माल नीचे आनेएर उसको बिल कुल नीचे ले जानेकी व्यवस्था एकतार बाँधकर की है। इस पहाड़में मिलनेवाली भिन्न भिन्न वनस्पतियाँ और तंतुओंके नमूने कोयमबटूरके जंगल पदार्थ संग्रहालयमें रखे गये हैं। इस जंगल में शिकार पाये जाते हैं। नील गाय, बारहसिंघा, बाघ, रीछ, इत्यादि यहाँ बहुत मिलते हैं। कुछ जंगली जातियाँभी इस जंगल में हैं। कादन, मुदवन, पुलैयन, मलसर इत्यादि इनमें से मुख्य हैं। (इं॰ ग॰ ५)

अनयमुड़ी——(हाथीका माथा) मद्रास इलाके मैं ट्रावनकोर राज्यके ठीक ईशान्यके कोनेको सह्यादि पर्वतकी चोटीपर यह उ॰ अ॰ १०°१०` और पू॰ रे॰ ७७°४ ` में स्थित है। इसको ऊंचाई ७७३७ फीट है। दक्षिण हिन्दुस्थानमें इसके समान ऊंचा पहाड़ और कोई नहीं है। इस पहाड़ से