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है। इस मूर्तिके चरणोंकी ओर लक्ष्मी और नाभि में से निकले हुये कमलासन ब्रह्मा दिखाये हैं। इसमें विष्णुके दशों अवतार भी दिखाये गये हैं। गोविन्दराव चिंचणीकी मृत्युके अनन्तर कोई भी अधिकारी न होने के कारण अनवल जब्त कर लिया गया। (बं॰ गॅ॰) अनवलोभन——द्विजोंके सोलह संस्कारों में से यह भी एक है। गृह्यकर्मीका वर्णन करने वाले गृह्यसूत्रोंमें इस संस्कारका उल्लेख अधिक नहीं मिलता। आश्वलायन गृह्यसूत्रों में इस संस्कार का वर्णन कुछ मिलता है। पुँसवन संस्कारके बाद यह संस्कार करनेका उल्लेख मिलता है। स्त्रीके गर्भवती होनेके तीसरे महीने में यह करना चाहिये। गर्भरक्षाके लिये ही यह संस्कार किया जाता है। इसी कारण से इसका यह नाम रखा गया है (न अवलुप्यते गर्भोऽनेन)। बहुधा यह संस्कार भी पुँसवन के साथही कर लिया जाता है। पतिद्वारा अश्वगन्धाका रस गर्भिणीके दाहिने नाकके छिद्र में छोड़नेकी क्रिया ही इस संस्कारका मुख्य भाग है। लोगोंका ऐसा विचार है कि इस रस-सिञ्चनसे गर्भनाशका भय नहीं रहता। रस सिंचनके समय जो मन्त्र पढ़ा जाता है (माहं पौत्रमघं नियाम्) वह भी अर्थकी दृष्टिसे अवसरानुकूल ही है। अनसिंग——वाशिम ताल्लुकेके अकोला जिलामें वाशिमसे १५ मीलपर आग्नेय दिशामें यह बसा हुआ है। यहाँकी जनसंख्या लगभग दो सहस्र है। पहले यह इस परगनेका मुख्य स्थान था। लोगोंका अनुमान है कि शृङ्गिऋषिके नामपर यह गाँव बसा हुआ है। इन ऋषिका एक मन्दिर गाँवके उजाड़ स्थानपर बना हुआ मिलता है। मन्दिर पुराने हेमाडपंथी ढङ्गका बना हुआ है। इस मन्दिरकी व्यवस्थाकेलिये लोगोंने छः गाँव इसके नामसे खरीदे हैं। पास ही एक बावड़ी और नाला है जिनमें सदा पानी भरा रहता है बावड़ीके तटपर सतीका एक हाथ गाड़ा हुआ है। इस विषयमें अनेक कथायें हैं। चूड़ियों से हाथ भरा हुआ था, इस कारणसे यह जल नहीं सका। कहा जाता है कि सतीके पिता दक्ष और उसके पति शिवमें विरोधके कारण जब उसे आत्महत्या कर लेनी पड़ी तो शिवने उसके शव अनेक खण्ड कर डाले। वे खण्ड ५१ स्थानोंपर गिरे। इस स्थानपर हाथ गिरा था। वह वहीं गाड़ दिया गया। इसके आसपासकी भूमि ऊसर है।१८९९-१९०० ई॰ के अकालमें यहाँ एक पहाड़ी |
तालाब बनवाया गया था। इसमें बारहों महीने पानी रहता है। और भी तीन तालाब हैं। यहाँ पुलिसका थाना है और हाट लगता है (अकोला डि॰ गॅ॰) अनसूया——(१) देवहूतीके गर्भसे उत्पन्न नौ कन्याओंमेसे एक कन्या। यह कदर्म ऋषिकी कन्या थी। स्वायंभू मन्वन्तरके ब्रह्म-मानस पुत्र अत्रि ऋषिकी यह स्त्री थी। (२) कहा जाता है कि वैवस्वत मन्वन्तरमें अत्रिने पुनः जन्म लिया था और उनकी स्त्री यही अनसूया हुई। अनसूया परम-पतिव्रता तथा महातपस्विनी थी। इसकी एक प्रसिद्ध कथा मिलती है कि एक बार निरन्तर दस वर्ष तक वर्षा न होनेपर भी इसने अपने तपोबलसे असीम कन्द, मूल,फल उत्पन्न करके असंख़्य प्राणियोंकी रक्षाकी थी। दूसरी कथा है कि जब माण्डव्य ऋषि सूलीपर चढ़ाये गये तो अन्धकारमें एक ऋषिपत्निसे उस शूलीको धक्का लगा, तो ऋषिने क्रुद्ध होकर श्राप दिया कि सूर्योदय होते ही तू वैधव्यको प्राप्त होगी। ऋषि-पत्निने भी अपने तपोबलसे सूर्योदय ही रोक रक्खा। इससे संसारका काम बन्द हो गया। यह ऋषिपत्नि अनसूयाकी परम सखी थी। सारे संसारमें हाहाकार मच गया सब ऋषि भी बड़े चिन्तित थे। जब उन्हें यह पता लगा कि वह ऋषि पत्नि अनसूया की परमसखी है तो सब ऋषि देवताओं को साथ ले अनसूया की शरणमें गये। अनसूयाने अपने तपोबलसे अपनी सखीका वैधव्य हरण कर सूर्योदय होने दिया। चित्रकूट के दक्षिण वनप्रदेशमें इसका आश्रम था। यहाँ पर श्रीरामचन्द्रने सीता तथा लक्ष्मण सहित वनवास कालमें इसके आश्रममें निवास किया था। अनसूयाने सीताको बड़े प्रेमसे पतिव्रत धर्म का उपदेश देकर दिव्यवस्त्र तथा अँगराग भेंट किया था। उस वस्त्रके पहिननेसे तथा अंगरागके अनुलेपनसे शरीर सुन्दर, स्वच्छ और विगत-श्रम होता था। (वाल्मी॰ रा॰ अ॰ ११७) एक स्थान पर इस प्रकार का उल्लेख आया है कि अत्रिसुत दत्तात्रेयकी यह माता थी। एक बार ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश इनके पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने आये। इसने अपने तपोबलसे इनको छोटे छोटे बालकोंके रूपमें परिवर्तन कर दिया। उन्हींका आगे चलकर दत्तात्रेय अवतार हुआ। अनहद——(अथवा अनाहद) इस शब्दका उल्लेख कबीरदासकी रचनाओंमें बारम्बार आया |
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अनवलोभन
अनहद
ज्ञानकोश (अ) २२९
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